
उदयपुर। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा उदयपुर की सड़कों पर उतरने जा रहे हैं। नगर निकाय चुनावों के ठीक पहले होने वाले इस भव्य मेगा रोड शो को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। संगठन इसे ऐतिहासिक बनाने में लगा है। पार्टी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को सख्त हिदायत है कि सड़कों पर ऐसा हुजूम दिखे जिससे विपक्ष के हौसले पस्त हो जाएं।
लेकिन राजनीति का एक सीधा नियम है—जब हुकूमत अपनी ही ताकत का ढोल बहुत जोर-शोर से पीटने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि दाल में कुछ काला है।
यह सवाल किसी के भी मन में उठना स्वाभाविक है कि आखिर एक स्थानीय निकाय चुनाव के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री को खुद धूप-धूल फांकते हुए सड़कों पर क्यों उतरना पड़ रहा है? निकाय चुनाव तो मूलतः स्थानीय मुद्दों, मोहल्लों की नालियों, सड़कों, सफाई और वार्ड के पार्षदों के भरोसे लड़े जाते हैं। वहां राज्य के मुखिया की व्यक्तिगत मौजूदगी क्या दर्शाती है? उदयपुर में यह पहला मौका है जब मुख्यमंत्री नगर निकाय चुनाव में रोड शो कर रहे हैं। इस रोड शो के लिए पूर्व मंत्री राजेंद्र राठौड़ उदयपुर में ही डेरा डाले हुए हैं।
उदयपुर के सियासी धरातल को अगर निष्पक्ष चश्मे से देखें, तो मामला बेहद पेचीदा नजर आता है। यह वह शहर है जहां पिछले तीस वर्षों से, यानी लगातार छह बार से, जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुमत देकर नगर निगम का ताज सौंपा है। तीन दशकों का यह अटूट सफर जहां भाजपा के लिए गौरव की बात हो सकता है, वहीं यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन चुका है। तीस साल का यह लंबा कालखंड अपने साथ सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इंकंबेंसी) की गहरी थकान लेकर आया है। जनता के मन में वर्षों से लंबित समस्याओं को लेकर जो ऊब और नाराजगी है, वह अब सतह पर दिखाई देने लगी है।
इसके साथ ही, इस बार के चुनाव में उदयपुर भाजपा को एक बहुत बड़ा खालीपन साल रहा है—गुलाबचंद कटारिया की गैर-मौजूदगी। कटारिया दशकों तक मेवाड़ और खासकर उदयपुर की सियासत के निर्विवाद धुरी रहे। टिकट तय करने से लेकर रूठों को मनाने और गुटबाजी को अपने कड़े अनुशासन में बांधे रखने का हुनर उन्हीं के पास था। अब जबकि वे संवैधानिक मर्यादाओं के तहत पंजाब के राज्यपाल हैं, स्थानीय चुनावी राजनीति में उनका कोई सीधा दखल नहीं रह गया है।
कटारिया की छत्रछाया हटते ही भाजपा के भीतर की गुटबाजी खुलकर चौराहों पर आ गई है। पार्टी कई धड़ों में बंटी नजर आ रही है। संगठन के भीतर खींचतान इस कदर हावी है कि खुद स्थानीय विधायक ताराचंद जैन को डैमेज कंट्रोल के लिए एक-एक वार्ड में जाकर पसीना बहाना पड़ रहा है, गली-कूचों के लगातार दौरे करने पड़ रहे हैं। जिस शहर में कभी पार्टी के सिंबल भर से जीत की गारंटी मान ली जाती थी, वहां आज विधायक को घर-घर मान-मनौव्वल करनी पड़ रही है।
ऐसे नाज़ुक दौर में मुख्यमंत्री का रोड शो क्या साबित करता है?
मेरी दृष्टि में यह शक्ति-प्रदर्शन भाजपा के आत्मविश्वास का प्रतीक कम और उसकी अंदरूनी बेचैनी की स्वीकारोक्ति ज्यादा है। जब स्थानीय नेतृत्व गुटबाजी के दलदल में फंसा हो, एंटी-इंकंबेंसी की आंच तेज हो और कटारिया जैसा कोई सर्वमान्य ‘खेवनहार’ मौजूद न हो, तब बगावत के सुरों को दबाने और कार्यकर्ताओं में कृत्रिम ऊर्जा भरने के लिए शीर्ष चेहरे का सहारा लेना ही पड़ता है।
उदयपुर में शक्ति-रथ को आगे बढ़ाने की यह कवायद सियासी लाभ का एक जाना-पहचाना उपक्रम है। हमारे देश की लोकतांत्रिक परंपरा में शक्ति-प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है, परंतु क्या जनता केवल नारों, कटआउटों और कारों के लंबे काफिले देखकर अपने वोट का फैसला करती है?
कतई नहीं। मतदाता अब बहुत चतुर हो चुका है। वह नेताओं के इस तमाशे को कौतूहल से देखता तो है, लेकिन मतपेटी के सामने पहुंचते ही वह अपने वार्ड की टूटी सड़क, पानी की किल्लत, तीस साल की उपेक्षा और स्थानीय पार्षदों के व्यवहार का हिसाब चुकता करता है।
यदि तीन दशक के शासन के बाद भी स्थानीय संगठन में इतना भरोसा नहीं बचा कि वह अपने बूते चुनाव निकाल सके, तो यह स्वीकार करने में संकोच क्यों कि नींव में दरारें बहुत गहरी हैं?
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उदयपुर की सड़कों पर उमड़ने वाला यह जनसैलाब केवल एक दिनी ‘इवेंट’ बनकर रह जाता है या सचमुच पार्टी के भीतर सुलगती गुटबाजी और जनता की नाराजगी की आग को बुझा पाता है। राजनीति में हुकूमत की चकाचौंध से आंखें चौंधियाई जा सकती हैं, परंतु जन-आक्रोश की तपिश को शांत करना केवल रोड शो के वश की बात नहीं होती।
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