
उदयपुर। लोकतंत्र में जब सत्ता को अपनी लोकप्रियता का बुखार चढ़ता है, तो वह सबसे पहले थर्मामीटर की जगह जनता की छाती पर अपना ‘रथ’ चढ़ा देती है। उदयपुर में भी यही हुआ। नगर निगम का चुनाव कोई आकाशीय घटना तो है नहीं, नाली, खड़ंजा और झाड़ू की मामूली देहाती रार है, मगर हुकूमत ने सोचा कि जब तक राजधानी से चलकर मुख्यमंत्री का चरण-स्पर्श लेकसिटी की तारकोल पर न हो, तब तक नाली का पानी बहेगा कैसे?
सो, अस्सी वार्डों के अस्सी भावी भाग्य-विधाताओं को हांफते हुए आगे कर एक भारी-भरकम जुलूस निकाला गया, जिसे आज की संभ्रांत भाषा में ‘मेगा रोड शो’ कहते हैं।
आयोजन की शुरुआत तो खैर परंपरा अनुसार ही हुई। जनसंघ के महापुरुष की प्रतिमा पर फूल लाद दिए गए। हमारे यहां पत्थरों की किस्मत भी खूब है—जब तक चुनाव न आए, वे धूल फांकते हैं, चुनाव आते ही उन्हें मालाओं से लादकर याद दिलाया जाता है कि महाराज, आपका बलिदान दरअसल अमुक वार्ड के टिकट के लिए ही हुआ था! इसके बाद मुख्यमंत्री को एक विशाल मेवाड़ी पगड़ी पहनाई गई। पगड़ी की गोलाई देखकर लग रहा था कि सत्ता का सारा बोझ सिर पर ही समाया है, और नीचे जो जनता खड़ी है, वह सिर्फ पगड़ी के नीचे दबे सिर को ताकने के लिए पैदा हुई है।
शाम को सूरजपोल से देहली गेट तक रथ रेंगने लगा। रथ पर सवार मुखारविंद से ज्ञान की ऐसी गंगा बही कि लोग हक्के-बक्के रह गए। फरमाया गया कि उदयपुर ‘राजस्थान का कश्मीर’ है! अब जो बेचारा पर्यटक दिल्ली या गुजरात से शांति की तलाश में आया था, वह पिछले तीन घंटे से अपनी टैक्सी का एसी बंद कर पसीने से तरबतर हॉर्न बजा रहा था। उसे लगा कि कश्मीर तो सचमुच बन गया है—बस फर्क इतना है कि वहां बर्फ की वजह से रास्ते बंद होते हैं, और यहां मुख्यमंत्री जी के स्वागत में फेंकी गई गेंदे की पंखुड़ियों और पुलिस के बैरिकेड्स ने चक्का जाम कर रखा है!
भाषण का सबसे दार्शनिक पहलू वह था, जिसे आधुनिक राजनीति में ‘इंजनों का गणित’ कहते हैं। बताया गया कि केंद्र में एक इंजन है, राज्य में दूसरा इंजन है, मगर गाड़ी फिर भी पूरी रफ्तार से नहीं दौड़ रही, लिहाजा शहर के हर नाले पर एक तीसरा इंजन फिट करना जरूरी है। यानी ‘ट्रिपल इंजन’! आमजन तो पूछते हैं कि भाई, अगर दो इंजनों के बाद भी गाड़ी धक्कामार चल रही हो, तो दोष पटरी का है, डिब्बों का है या फिर दोनों ड्राइवरों को ठीक से चाबी घुमाना नहीं आता? पर जनता तो ताली बजाने के लिए बुलाई गई थी। ताली बजी, नारे लगे, और ठीक उसी वक्त सौ मीटर दूर एक एंबुलेंस जाम में फंसी अपने तीसरे इंजन को तलाश रही थी।
विपक्ष को लताड़ते हुए ‘काकाजी’ से लेकर ‘लूट की दुकान’ तक के मुहावरे हवा में उछाले गए। संकल्प पत्र के 78 प्रतिशत काम पूरे होने का गणित भी समझाया गया। हिसाब इतना पक्का था कि जैसे कोई पटवारी खेत नाप रहा हो। 78 प्रतिशत विकास हो चुका है, अब बचा-खुचा 22 प्रतिशत शायद उसी जाम में फंसा हुआ था, जो सूरजपोल से लेकर कोर्ट चौराहे तक पसरा था।
बीजेपी के जारी प्रेस नोट ने अंत में बड़े फख्र से ऐलान किया कि ‘जनसैलाब उमड़ पड़ा।’ हुकूमत की आंखें हमेशा ऐसी ही होती हैं—वे बंधक बनी जनता को भी ‘उमड़ा हुआ जनसैलाब’ पढ़ती है। जो दुकानदार अपने शटर गिराकर सड़क खुलने का इंतजार कर रहे थे, वे दरअसल ‘विकास के संकल्प’ से नहीं, पेट की मरोड़ और घुटते ट्रैफिक से कराह रहे थे।
खैर, रोड शो निपट गया। रथ आगे बढ़ गया। नेताजी ने हाथ हिलाकर हाथ में आया पसीना पोंछ लिया। पीछे रह गए सड़क पर बिखरे फूलों के कुचले हुए पत्ते, दो-चार प्लास्टिक के झंडे, और वो अभागा आम आदमी, जो रात नौ बजे घर पहुंचकर अपनी पत्नी से यही कह पाया—”आज सब्जी नहीं ला पाया, रास्ते में ट्रिपल इंजन खड़ा था!”
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