
नई दिल्ली। देश की राजधानी में ज्ञान की तलाश में आने वाले नौजवानों के लिए व्यवस्था ने रहने का बड़ा ही मुकम्मल इंतजाम कर रखा है। दिल्ली विश्वविद्यालय का साउथ कैंपस ज्ञान बांटता है, और ठीक सामने बसा सत्य निकेतन इलाका उस ज्ञान की परीक्षा लेता है—यह परखने के लिए कि छात्र मलबे के नीचे सांस कितनी देर रोक सकते हैं! रविवार की दुपहरी जब एक पांच मंजिला इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई, तो दरअसल कोई मकान नहीं गिरा, बल्कि शिक्षा तंत्र और नगर निगम की उस साझी बेशर्मी का पर्दाफाश हुआ, जो हर महीने एक-एक खटोले का अठारह हजार रुपया वसूलती है।
हादसे की पटकथा बड़ी वैज्ञानिक थी। बेसमेंट में खुदाई चल रही थी। ठेकेदार शायद नींव में छुपा कोई पुराना खजाना ढूंढ रहे थे या फिर धरती के केंद्र तक पीजी का विस्तार करने की फिराक में थे। नतीजा वही हुआ जो होना था—कमजोर पिलर ने हाथ खड़े कर दिए और चार-चार इंच की दीवारों पर खड़ी पांच मंजिला मीनार धड़ाम से जमीन पर आ गिरी। पुलिस के कागजों में अब तक तीन मौतों की तस्दीक है और सात अस्पताल में भर्ती हैं, बाकी मलबे के नीचे कितने भविष्य दबे हैं, इसका हिसाब भगवान और स्थानीय प्रॉपर्टी डीलर ही जाने।
छात्रों का अपराध सिर्फ इतना था कि उन्होंने देश के प्रतिष्ठित कॉलेजों में दाखिला ले लिया था। कॉलेज प्रशासन का गणित बड़ा सरल और दार्शनिक है—अगर सोशियोलॉजी की क्लास में 75 बच्चे हैं, तो हॉस्टल सिर्फ दो को मिलेगा! बाकी 73 बच्चों के लिए दुनिया एक खुला रंगमंच है, जहां वे सत्य निकेतन के 100 से अधिक दरबों में अपनी जान जोखिम में रखकर ‘स्वतंत्रता’ का आनंद लें। न कोई सुरक्षा ऑडिट, न कोई फायर एनओसी, और इमारत ऐसी जिसे पिछले साल कथित तौर पर ब्लैकलिस्ट किया गया था, लेकिन नए साल के नए शिकार (यानी नए बैच) आते ही वह रहस्यमयी तरीके से फिर ‘फिट’ हो गई।
इमारत भरभराकर गिरी, धूल का गुबार उठा, तो आसपास चाय की थड़ियों पर खड़े छात्रों ने अपने हाथों से मलबा हटाना शुरू किया। प्रशासन हमेशा की तरह अपनी गरिमा के साथ आराम से पहुंचा। उधर जैसे ही खबर टीवी पर फ्लैश हुई, शोक संदेशों की गंगा बह निकली। प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री और विपक्ष के बड़े नेताओं तक—सबके सोशल मीडिया हैंडल पर ‘गहरी संवेदना’ का बटन दब गया। व्यवस्था में संवेदना सबसे सस्ती चीज है; इसके लिए न सीमेंट-बदरपुर की मजबूती चाहिए और न ही अफसरों की ईमानदारी।
स्थानीय छात्र सहमे हुए हैं। घरों से फोन आ रहे हैं, डरे हुए मां-बाप कह रहे हैं कि डिग्री बाद में ले लेना, पहले जिंदा लौट आओ। डूसू के चुनावों में हॉस्टल और सुरक्षा के जो वादे पर्चों पर छपकर गलियों में उड़ते थे, वे आज मलबे के नीचे दब चुके हैं।
हुक्मरानों को शायद लगता है कि छात्र केवल वोटर और किराया देने वाली मशीन हैं। बेसमेंट खोदकर इमारतें खड़ी होती रहेंगी, छात्र अठारह हजार रुपये देकर अपनी जिंदगी दांव पर लगाते रहेंगे, और अगली बार जब कोई और पिलर हिलेगा, तो संवेदना का नया ट्वीट ड्राफ्ट करने के लिए एक कमेटी फिर बैठा दी जाएगी।
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