
सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर।
उदयपुर नगर निगम का चुनाव इस बार केवल पार्षदों के चयन का अखाड़ा नहीं रह गया है, बल्कि यह कई राजनीतिक दिग्गजों के लिए निजी प्रतिष्ठा की अग्निपरीक्षा बन चुका है। वार्ड नंबर 17 की हलचल इसी की एक जीती-जागती मिसाल है। यहाँ से कांग्रेस ने डॉ. पूनम कुंवर राठौड़ को मैदान में उतारा है। पूनम जी स्वयं एक बेहद सरल, मृदुभाषी और सुशिक्षित महिला हैं, लेकिन राजनीति का तकाजा देखिए कि चुनावी चौसर पर उनकी पहली और बड़ी पहचान शहर कांग्रेस अध्यक्ष फतहसिंह राठौड़ की धर्मपत्नी के तौर पर आंकी जा रही है। बीजेपी ने भी इस वार्ड से जुझारू महिला मीना कुंवर को उतारा है।
अब सवाल यह है कि एक पढ़े-लिखे महिला प्रत्याशी के मैदान में उतरने से किसी की साख पर बन क्यों आई है?
बात सीधी है। वार्ड 17 का चुनावी इतिहास कांग्रेस के लिए कभी फूलों की सेज नहीं रहा। पिछले छह मुकाबलों में से चार बार भाजपा का परचम लहराया है और कांग्रेस सिर्फ दो बार ही बाजी मार पाई है। यह वही इलाका है जहाँ से कभी कांग्रेस के कद्दावर नेता दिनेश श्रीमाली पार्षद बनकर विधानसभा तक की दौड़ में शामिल हुए थे। इतना ही नहीं, यह वार्ड निवर्तमान उप-महापौर पारस सिंघवी का मजबूत गढ़ रहा है, जो इस मर्तबा खुद वार्ड 24 से नई बिसात बिछा रहे हैं।
कहावत है कि जब घर में आग लगे तो मुखिया को ही आगे आना पड़ता है। जब इस कठिन सीट पर कोई भी कांग्रेसी कार्यकर्ता ताल ठोकने की हिम्मत नहीं जुटा सका, तब जिलाध्यक्ष फतहसिंह राठौड़ के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया—मैदान खाली छोड़ें तो बदनामी, और लड़े तो सीधा जोखिम। राजपूत परंपरा का तकाजा यही कहता है कि जंग से पीठ दिखाने की बजाय छाती तानकर मुकाबला किया जाए और अंजाम विधाता पर छोड़ दिया जाए। फतहसिंह जी ने वही किया। कभी उन्होंने खुद इसी जमीन पर सिंघवी को पसीने ला दिए थे, जिसका इनाम उन्हें जिलाध्यक्ष की कुर्सी के रूप में मिला था। आज उसी रणभूमि में उन्होंने अपनी अर्धांगिनी को उतार दिया है।
परंतु डॉ. पूनम कुंवर किसी की ओट में छिपकर वार करने वालों में से नहीं हैं। वे पूरी विनम्रता और स्पष्टवादिता के साथ स्वीकार करती हैं कि इस चुनाव में उनके पति और कांग्रेस, दोनों का मान दांव पर लगा है। वे कहती हैं कि जनता से उनका रिश्ता केवल वोटों का नहीं, दिलों का है। वे बुनियादी सवालों को लेकर जनता के बीच हैं—नाइयों की तलाई में महिलाओं का सरकारी स्नानघर दस बरस से ताले में क्यों बंद है? तीस सालों के भाजपाई राज के बावजूद नल से पानी और तार से बिजली के लाले क्यों पड़े हैं? तथाकथित ‘स्मार्ट सिटी’ के नाम पर सीवरेज और नालियों ने शहर को सहूलियत दी या नई मुसीबतें?
डॉ. पूनम का कहना बड़ा बेबाक और सच्चा है: “राठौड़ साहब पर पूरे शहर के वार्डों की जिम्मेदारी है। मैं अकेली ही अपनी लड़ाई लड़ना जानती हूँ, क्योंकि जनता मेरे साथ है।”
भारतीय राजनीति में पत्नियों को अक्सर डमी या मोहरा मान लिया जाता है, लेकिन जब एक शिक्षित स्त्री अपने परिवार की प्रतिष्ठा और जनता के बुनियादी हकों की ढाल बनकर धूप में निकलती है, तो समीकरण बदलने लगते हैं। उदयपुर की जनता अब इस कसौटी पर फैसला करेगी कि क्या एक निष्ठावान पत्नी अपने पति और दल की साख को बचा पाती है या नहीं।
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