उदयपुर नगर निगम चुनाव-वार्ड 75 : अरावली की धूप, 36 कौम का आंगन और 14 बरस का वनवास

सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर।

सिनेमा के पर्दे पर जब कोई कहानी लंबी चलती है, तो उसका एक-एक किरदार वक्त के साथ गहरा होता चला जाता है। राजकपूर की आवारा का वह गीत जेहन में गूंजता है—‘दम भर जो उधर मुंह फेरे, ओ चंदा…’। सियासत भी कुछ ऐसी ही धूप-छांव का खेल है। कभी आप आसमान पर होते हैं, तो कभी सालों तक खामोशी के नेपथ्य में अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है।

झीलों की नगरी उदयपुर के वार्ड 75 की चुनावी बिसात को जब आप करीब से देखते हैं, तो यह महज एक पार्षद के चुनाव का सतही दृश्य नहीं लगता। यह एक पुराने मंझे हुए अभिनेता का अपनी जड़ों की ओर लौटना है, एक ऐसा किरदार जिसकी पेशानी पर छात्र राजनीति के पसीने से लेकर नगर निगम के गलियारों तक का तजुर्बा दर्ज है।

यह वार्ड अपने आप में हिंदुस्तान का एक छोटा-सा अक्स है। एक तरफ कच्ची बस्तियां, जहां चूल्हों से उठता धुआं रोजमर्रा की जद्दोजहद की गवाही देता है, तो दूसरी तरफ पुलां और मॉडर्न कॉम्प्लेक्स की पक्की सड़कें और चमकती बालकनियां, जहां मध्यम और धनाढ्य वर्ग अपने सपनों का ताना-बाना बुनता है। 36 कौमों का यह ताना-बाना अपनी विविधताओं के साथ किसी बहुमंजिला सेट की तरह खड़ा है। पुराने नुमाइंदों के प्रति एक दबी हुई नाराजगी यहां की हवा में साफ महसूस होती है। ऐसे में जब भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी खींचतान के दौर में भी महेंद्र सिंह शेखावत का नाम बिना किसी विरोध के सामने आता है, तो समझ आता है कि जमीन पर इस चेहरे की साख क्या है। कांग्रेस ने तुलसीराम लोहार को उतारा है, जिनका अपना वजूद है, और तीन निर्दलीय भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। मगर केंद्र में महेंद्र सिंह शेखावत ही खड़े दिखाई देते हैं।

महेंद्र सिंह शेखावत का जिक्र आते ही तीन दशक पुरानी मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी का प्रांगण याद आता है। छात्रसंघ अध्यक्ष के दौर से लेकर एक दशक तक वे छात्रों की हर उलझन का आखिरी पड़ाव रहे। आज भी उनका नाम आते ही स्मृति में एक छात्रनेता की छवि ही बनती है। आज वार्ड 75 की गलियों में भी मंजर जुदा नहीं है।

फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ का वह मर्मस्पर्शी तराना याद आता है—‘अपनी कहानी छोड़ जा, कुछ तो निशानी छोड़ जा…’। लोग यहां चुनावी भाषण सुनने नहीं आते, वे हाथों में अपने रुके हुए कामों की पर्चियां थमाए खड़े मिलते हैं। शेखावत का अंदाज किसी नेता का नहीं, बल्कि एक पुराने आत्मीय पड़ोसी का है। कच्ची बस्ती की तंग गलियों में वे वैसे ही घुलमिल जाते हैं जैसे कोई अपना बेटा घर लौटा हो, और जब मॉडर्न कॉम्प्लेक्स के ड्राइंग रूम में बैठते हैं, तो पानी-बिजली के गड्ढों से ऊपर उठकर यूडी टैक्स, रॉयल्टी, पर्यटन और शहरी अर्थशास्त्र पर गंभीर बातचीत करते हैं। समस्याओं को केवल सुनना नहीं, उनके समाधान की पगडंडी तुरंत तलाश लेना उनकी पुरानी आदत है।

बातचीत में जब उनसे शहर के भविष्य का जिक्र छिड़ा, तो उनकी आंखों में आयड़ नदी के किनारे खाली पड़ी जमीन को एक नया पर्यटन लैंडमार्क बनाने का खाका साफ नजर आया। वे मेयर पद की दावेदारी का ढोल नहीं पीटते, मगर ट्रैफिक और पार्किंग की नब्ज पर उनका हाथ वैसा ही है जैसा किसी कुशल डॉक्टर का होता है। वे जानते हैं कि उदयपुर की धड़कन पर्यटन से चलती है, और अगर यह नब्ज दुरुस्त हो जाए, तो शहर की रफ्तार खुद-ब-खुद बढ़ जाएगी।

पिछले दिनों जब शहर विधायक ताराचंद जैन ने उनके समर्थन में मंच संभाला, तो एक गहरा वाक्य कह गए—‘मेरा 9 साल का वनवास था और शेखावत का 14 बरस का वनवास अब पूरा हुआ है।’

रामायण का प्रसंग हो या सियासत की धूप-छांव, वनवास के बाद जब कोई किरदार दोबारा जनता की अदालत में आता है, तो उसकी परीक्षा सिर्फ जीत-हार की नहीं होती। वह इस बात की कसौटी होती है कि क्या जनता अपने इस पुराने साथी को वही पुराना भरोसा लौटाएगी?

फिल्म ‘सफर’ का वह अमर गीत अनायास होंठों पर तैर जाता है—

‘ज़िंदगी का सफर, है ये कैसा सफर…

कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं…’

मेयर कौन बनेगा और सत्ता के ऊंचे दफ्तरों में किसकी कुर्सी लगेगी, यह तो भविष्य के धुंधलके में छुपा है। मगर वार्ड 75 की इस जमीन पर आज एक बात तय है—किरदार पुराना है, मंच सजा हुआ है, और जनता अपने इस पुराने साथी के साथ लोकतंत्र का एक नया दृश्य रचने को बेताब है।

 

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