जहां दुनिया शारीरिक अक्षमता देखती है, हम वहां अटूट हौसला और ईश्वर का स्वरूप देखते हैं — प्रशांत अग्रवाल

नारायण सेवा संस्थान के 47वें नि:शुल्क दिव्यांग सामूहिक विवाह समारोह के भावुक पलों के बीच संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल की सैयद हबीब से खास बातचीत

उदयपुर। जीवन के कठिन रास्तों पर जब शारीरिक अक्षमता या आर्थिक अभाव आड़े आते हैं, तो एक सामान्य जीवन और घर-आंगन बसाने का सपना भी अधूरा सा लगने लगता है। ऐसे ही अधूरे सपनों को पूरा करने और दिव्यांगजनों के जीवन में खुशियों के नए रंग भरने का कार्य नारायण सेवा संस्थान विगत कई दशकों से कर रहा है।

संस्थान के 47वें सामूहिक विवाह समारोह के पावन अवसर पर हमने नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक प्रशांत अग्रवाल से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस भावपूर्ण आयोजन, जीवन के संघर्षों और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े इस साक्षात्कार के प्रमुख अंश…।

सवाल 1 : प्रशांत जी, जब 51 दिव्यांग और निर्धन जोड़े पीले परिधानों में एक-दूसरे का हाथ थामकर मंच पर बैठते हैं, तो एक संस्थान अध्यक्ष के रूप में आपके भीतर कौन से भाव उमड़ते हैं?

प्रशांत अग्रवाल: यह क्षण केवल एक आयोजन या रस्म भर नहीं होता, यह एक अलौकिक अनुभूति है। जब मैं इन बच्चों के चेहरों पर बरसों के लंबे इंतजार के बाद खिलने वाली पहली निश्छल मुस्कान देखता हूँ, तो लगता है कि जैसे संसार की सारी खुशियाँ इसी मंडप में सिमट आई हैं। किसी ने अपनी शारीरिक चुनौती के कारण अकेलेपन का लंबा दौर झेला होता है, तो किसी ने आर्थिक बेबसी में अपने सपनों को दबा दिया होता है। जब वे दोनों एक-दूसरे का सहारा बनते हैं, तो ऐसा लगता है कि संघर्ष पीछे छूट गया और जिंदगी ने उम्मीदों का नया रंग ओढ़ लिया है। यह मेरे और हमारे पूरे संस्थान परिवार के लिए अत्यंत भावुक कर देने वाला पल होता है।

सवाल 2: समाज में आज भी दिव्यांगता को एक अभिशाप या बेबसी के रूप में देखा जाता है। इस धारणा को बदलने में यह आयोजन कितना सफल रहा है?

प्रशांत अग्रवाल: समाज जहाँ केवल कमियाँ या कमज़ोरियाँ देखता है, हम वहाँ ईश्वर की विशेष कृति और उनका अटूट साहस देखते हैं। हमारा उद्देश्य केवल इनका विवाह कराना नहीं, बल्कि इन्हें समाज में वह सम्मानजनक स्थान दिलाना है जिसके ये वास्तव में हकदार हैं। जब ये जोड़े एक साथ नए जीवन की शुरुआत करते हैं, तो वे दुनिया को यह संदेश देते हैं कि जिंदगी की पहचान परिस्थितियों से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के सामने सीना तानकर खड़े रहने के हौसले से होती है। हर साल यह आयोजन समाज की उस पुरानी सोच पर एक करारा प्रहार करता है और लोगों को यह अहसास कराता है कि ये बेबस नहीं, बल्कि हमारी प्रेरणा हैं।

सवाल 3: इन 51 जोड़ों में से हर किसी की अपनी एक अलग और संघर्षपूर्ण कहानी होती है। क्या कोई ऐसा पल या किस्सा है जिसने आपके दिल को गहराई से छुआ हो?

प्रशांत अग्रवाल: (थोड़े भावुक होते हुए) ऐसे तो अनगिनत किस्से हैं, लेकिन जब कोई दृष्टिहीन बेटी अपने भावी जीवनसाथी का हाथ छूकर उसके विश्वास को महसूस करती है, या जब बैसाखियों के सहारे चलने वाला युवा मुस्कुराते हुए अपनी दुल्हन की माँग भरता है, तो आँखें अपने आप नम हो जाती हैं। कई बार ऐसे जोड़े आते हैं जिनके अपने परिवार ने ही उन्हें बोझ मानकर त्याग दिया था। जब वे यहाँ आकर कहते हैं— “प्रशांत भैया, आज हमें लगा कि हमारा भी कोई अपना है”, तो लगता है कि हमारी बरसों की तपस्या सफल हो गई। यहाँ दो लोग केवल विवाह के बंधन में नहीं बंधते, बल्कि एक-दूसरे के अधूरेपन को पूरा करने की जिम्मेदारी उठाते हैं।

सवाल 4: विदाई का समय किसी भी पिता या परिवार के लिए सबसे कठिन होता है। जब ये बेटियाँ गृहस्थी का सामान लेकर यहाँ से विदा होती हैं, तो संस्थान की क्या भावना रहती है?

प्रशांत अग्रवाल: हमारे यहाँ से जब बेटियाँ विदा होती हैं, तो वह माहौल किसी भी सगे पिता के घर जैसा ही भावुक होता है। हर बेटी को एक नए गृहस्थ जीवन की सुगम शुरुआत के लिए आवश्यक तमाम सामग्रियां—जैसे सिलाई मशीन, बर्तन, बिस्तर, आभूषण और दैनिक उपयोग की वस्तुएं उपहार स्वरूप दी जाती हैं। लेकिन सामग्री से भी बड़ी चीज जो हम उन्हें देते हैं, वह है ‘अटूट विश्वास’। हम उनसे यही कहते हैं कि यह नारायण सेवा संस्थान आपका अपना मायका है। विवाह के बाद भी यदि जीवन में कभी कोई कठिन समय आए, तो यह संस्थान हमेशा उनके साथ खड़ा रहेगा।

सवाल 5: सेवा के इस महायज्ञ को 47वें पड़ाव तक पहुँचाना आसान नहीं रहा होगा। आने वाले समय के लिए नारायण सेवा संस्थान का क्या संकल्प है?

प्रशांत अग्रवाल: यह सब ईश्वर की कृपा और देश-विदेश से जुड़ने वाले लाखों भामाशाहों व सेवाभावी सहयोगियों के संबल से ही संभव हो पाया है। हमारा संकल्प केवल विवाह कराने तक सीमित नहीं है। हम ‘वर्ल्ड ऑफ ह्यूमैनिटी’ जैसे प्रकल्पों के माध्यम से इनके नि:शुल्क इलाज, कृत्रिम अंग (Prosthetics) लगाने, रोजगारपरक कौशल प्रशिक्षण (Skill Training) और पुनर्वास के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं। हमारा सपना है कि देश का कोई भी दिव्यांग खुद को बेबस या अकेला न समझे। जब तक सांसें हैं, यह सेवा यात्रा बिना रुके इसी आत्मीयता के साथ जारी रहेगी।

 

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