
सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर

सिनेमा के सुनहरे दौर में मनोज कुमार की फिल्म ‘उपकार’ का वो अमर गीत अक्सर जेहन में गूंजता है—‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती…’। हरियाली को हमारी संस्कृति में जीवन, अन्न और खुशहाली का प्रतीक माना गया है। लेकिन जब वही पावन हरियाली एक समूची पीढ़ी की रगों में धीमा ज़हर घोलने लगे, तो समाज के किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप उठती है।
अरावली की हरी-भरी वादियां, जो सदियों से अपनी प्राकृतिक सुघड़ता, लोककथाओं और सरिताओं के लिए जानी जाती रही हैं, आज वहां इंसानी लालच ने एक स्याह पटकथा लिख दी है। यह पटकथा है—’नशे की हरियाली’ की। प्रकृति ने जो ज़मीन अन्न उपजाने के लिए दी थी, मुनाफे के अंधे सौदागरों ने उसी मिट्टी में गांजे और भांग के बीज बो दिए।
उदयपुर पुलिस का ‘जागृति’ अभियान दरअसल उसी पर्दे को उठाने की ईमानदार कोशिश है, जिसके पीछे यह घिनौना खेल खेला जा रहा था। जिला पुलिस अधीक्षक डॉ. अमृता दुहन के निर्देशन में खाकी ने इस तिलिस्म पर सीधा प्रहार किया है।
माण्डवा की दुर्गम पहाड़ियों में जब पुलिस का दस्ता नदी फला साडी के बीहड़ों में उतरा, तो मंज़र हैरान कर देने वाला था। पुलिस की नज़रों से छिपकर उगाई जा रही 11 क्विंटल से ज्यादा (1149.5 किलोग्राम) गांजा और भांग की फसल लहलहा रही थी। खेतों में खड़ी यह हरियाली किसी किसान की मेहनत नहीं, बल्कि जवानी को बर्बाद करने वाला ज़हर थी, जिसे पुलिस ने उखाड़कर नष्ट कर दिया। इसी कड़ी में कोटड़ा क्षेत्र में वाकल नदी के किनारे भी 192.22 किलोग्राम गीले और हरे गांजे के पौधे पकड़े गए। पवित्र नदियों के किनारों और शांत घाटियों को तस्करों ने नशे की नर्सरी बना दिया था।
मगर कहानी सिर्फ अरावली की इन पगडंडियों तक सीमित नहीं है। इसका एक और आधुनिक और डरावना सिरा शहर की चकाचौंध में खुलता है। हिरणमगरी में पुलिस ने एक बिना नंबर की सफेद स्कॉर्पियो को घेरकर रोका, जिसके भीतर से करीब 50 लाख रुपये मूल्य की 470 ग्राम एमडीएमए (MDMA) ड्रग्स बरामद हुई। बाड़मेर के गुढ़ामालानी से आई यह ‘सिंथेटिक मौत’ शहर के नौजवानों के बीच खपने जा रही थी। तीन सौदागर पकड़े गए।
यह पूरा घटनाक्रम किसी थ्रिलर फिल्म की तरह लगता है, जहां एक तरफ बीहड़ों में छिपी ‘नशे की हरियाली’ है, तो दूसरी तरफ हाईवे पर दौड़ती लक्जरी गाड़ियों में केमिकल वाला ज़हर। लेकिन यह कोई सिनेमाई फंतासी नहीं, हमारे अपने समाज की कड़वी हकीकत है।
हरियाली जब फसल बनकर खलिहानों में आती है, तो जिंदगी मुस्कराती है; लेकिन जब वही हरियाली नशे की शक्ल लेकर उतरती है, तो घरों के चिराग बुझा देती है। खाकी ने 13 क्विंटल से ज्यादा इस हरी मौत और 50 लाख के ड्रग्स को ज़ब्त कर कानून का फर्ज तो निभा दिया, मगर सबसे बड़ा सवाल अब भी समाज के सामने खड़ा है—हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या सौंप रहे हैं? शुद्ध हवा और अन्न का अनुराग, या फिर नशे के काले कारोबार में लिपटी यह अंधी हरियाली?
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