
उदयपुर/मुंबई। सिनेमा क्या है? यह केवल परदे पर रची गई कुछ घंटों की कहानी नहीं है, बल्कि यह इंसानी फितरत, उसके अकेलेपन और उसकी जद्दोजहद का वह दस्तावेज है, जिसे कुछ चुनिंदा कलाकार अपनी आंखों की नमी और आवाज के भारीपन से अमर कर देते हैं। नाना पाटेकर महज़ एक अभिनेता नहीं थे; वे इस देश के सिनेमाई विवेक का एक ऐसा आईना थे, जिसमें जब भी समाज ने झाँका, उसे अपनी असलियत से डर लग गया।

आज जब नाना हमारे बीच नहीं रहे, तो मन बरबस उस दौर में चला जाता है जब वे हिंदी सिनेमा के कैनवास पर अपनी अनूठी शैली के रंग भर रहे थे। उनके निधन की खबर ने मानो सिनेमा के एक पूरे अध्याय पर विराम लगा दिया है।
अगर हमें नाना के अभिनय की रेंज और उनकी शख्सियत की गहराई को समझना हो, तो उनकी 1997 में आई फिल्म ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ को याद करना होगा। यह फिल्म व्यावसायिक सिनेमा के ढांचे में रची गई थी, लेकिन इसमें जो एक अंडरवर्ल्ड डॉन का किरदार नाना ने निभाया—मुस्तफा—वह महज़ एक गैंगस्टर नहीं था। वह एक ऐसा इंसान था जो वफादारी, उसूलों और भीतर के असीम अकेलेपन के बीच झूल रहा था।
गौर कीजिए, हिंदी फिल्मों में खलनायक या डॉन अक्सर या तो हंसते हुए खून बहाते हैं या फिर दहाड़ते हैं। लेकिन नाना पाटेकर का ‘मुस्तफा’ अलग था। वह जब खामोश रहता था, तो उसकी आंखें बोलती थीं। उसकी वह खामोशी स्क्रीन पर एक भारी सन्नाटा पैदा कर देती थी। फिल्म के वे दृश्य आज भी जेहन में ताजा हैं, जहां पर्दे पर एक डॉन को तहज्जुद की रात में या तन्हाई में करीम की इबादत करते, झुककर नमाज अदा करते और श्रद्धा व ठहरे हुए सुकून के साथ कुरान की आयतों का पाठ करते हुए दिखाया गया था। वह दृश्य किसी फलां किरदार का पाखंड नहीं था, बल्कि वह उस आदमी की रूह की शुद्धि की छटपटाहट थी, जो अपराध की दलदल में फँसने के बावजूद खुदा से अपना राब्ता टूटने नहीं देना चाहता था।
फिल्म में जब वह अपनी ‘अम्मी’ जैसी ममता की तलाश में भटकता है, या जब वह अपने उन उसूलों के लिए खड़ा होता है जो उसकी दुनिया में बेमानी हो चुके हैं, तब नाना पर्दे पर अभिनय नहीं कर रहे होते—वे अपने भीतर के किसी अनकहे दर्द को जी रहे होते हैं। ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ का वह किरदार हमें यह सिखाता है कि ताकत और क्रूरता के आवरण के पीछे भी एक ऐसा इंसान छिपा हो सकता है, जो जुबान पर खुदा का नाम और दिल में रहमत की एक अदृश्य बूंद के लिए तरसता रहता है। नाना ने उस किरदार में जो जान फूंकी, वह किसी अभिनय स्कूल की किताबों में नहीं मिलती; वह उनके उस तजुर्बे और जीवन की गहरी समझ से आती थी।
आज जब वे हमेशा के लिए परदे के पीछे जा चुके हैं, तो लगता है कि सिनेमा का एक ऐसा सूरज डूब गया जिसकी रोशनी नकली चकाचौंध से कोसों दूर थी। ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ का वह डॉन, ‘प्रहार’ का वह फौजी, ‘क्रांतिवीर’ का प्रताप और ‘अब तक छप्पन’ का वह शांत कमिश्नर—सब मिलकर एक ऐसा मुकम्मल इतिहास बनाते हैं जिसे आने वाली पीढ़ियाँ हमेशा याद रखेंगी।
अलविदा नाना! आपने सिनेमा को वह शिद्दत दी जो सदियों तक याद रखी जाएगी।
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