
फोटो : कमल कुमावत

उदयपुर। राजनीति जब अपनी संवादहीनता के उस मुकाम पर पहुंच जाती है, जहां विपक्ष की आवाज सुनने के बजाय पुलिस के डंडे और बैरिकेड्स से रास्ते तय किए जाने लगें, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र की गाड़ी किसी खतरनाक ढलान पर है। उदयपुर में गुरुवार को जो कुछ हुआ, वह महकमे की सख्ती या कार्यकर्ताओं का आक्रोश भर नहीं था; यह उस गहरी बेचैनी का प्रकटीकरण था जो आज देश की संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर आम नागरिकों के मन में सुलग रही है।
इंडिया गठबंधन के आह्वान पर जब उदयपुर के टाउन हॉल से कलेक्ट्रेट तक विरोध मार्च निकला, तो हवा में सिर्फ नारे नहीं थे, बल्कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठ रहे गंभीर सवाल थे। वोटर लिस्ट के एसआईआर (SIR) को लेकर उपजा विवाद अब सिर्फ दफ्तरों की फाइलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह सड़कों पर उतर आया है। जब कलेक्ट्रेट के बाहर उग्र कार्यकर्ता बैरिकेड्स पर चढ़ने की जिद कर रहे थे, तो वह दृश्य इस बात का गवाह था कि जनता अब खामोश रहने को तैयार नहीं है।
स्थिति तब और तल्ख हो गई जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झूमाझटकी में बैरिकेड्स धराशायी हो गए। एडिशनल एसपी और थानाधिकारियों को जब भीड़ को पीछे धकेलने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा, तो यह नजारा सिर्फ कानून-व्यवस्था को संभालने भर का नहीं था, बल्कि यह बताता है कि सरकार और जनता के बीच की दीवारें कितनी चौड़ी हो चुकी हैं। टाउन हॉल से शुरू होकर बापू बाजार और दिल्ली गेट से गुजरते हुए जब यह कारवां कोर्ट चौराहा पहुंचा, तो वहां मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का पुतला दहन केवल एक प्रतीकात्मक विरोध नहीं था, बल्कि यह उस व्यवस्था को चेतावनी थी जो निष्पक्षता के अपने बुनियादी दायित्व से भटकती नजर आ रही है।
शहर कांग्रेस अध्यक्ष फतहसिंह राठौड़, कम्यूनिष्ट पार्टी के राजेश सिंघवी और देहात के नेताओं की अगुवाई में उठी यह आवाज इस देश के उस मूल राजनीतिक चरित्र की याद दिलाती है, जहाँ असहमतियों को कुचलने के बजाय सुना जाना चाहिए था। जब संवैधानिक संस्थाओं की साख पर बट्टा लगता है, तो सड़क पर उतरा हर एक नागरिक विपक्ष का हिस्सा बन जाता है। उदयपुर की इन सड़कों पर जो जिद और जद्दोजहद दिखाई दी, वह महज़ हंगामे की दास्तान नहीं है, यह इस बात की तस्दीक है कि लोकतंत्र में जब संवाद के दरवाजे बंद होते हैं, तो खिड़कियां तोड़कर हवा अंदर आने की कोशिश करती ही है।
About Author
You may also like
स्मृति शेष : भट्टियानी चौहट्टा की ‘रजनी (गीता देवी)’ और एक सादगी भरी विदाई
उदयपुर डायरी : रात का खाना, चौड़ी सड़कें और बदलते शहर की तस्वीर
एक्शन मोड में नवनिर्वाचित महापौर: दिन में जनसमस्याओं का समाधान, युवाओं को रोजगार की राहत और रात में सड़कों पर उतरकर परखी शहर की व्यवस्थाएं
सिनेमा का एक युग और गुलाम-ए-मुस्तफा की वह खामोश गूंज
अपनों के बीच से अचानक उठा एक साया : झाड़ोल थानाधिकारी बुद्धराम बिश्नोई की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत
