उदयपुर। अक्सर हम संवेदना को केवल इंसानी आंसुओं और बोलती हुई चीखों तक सीमित मान बैठते हैं। जो बोल सकता है, वह अपनी विपदा का ब्योरा दे देता है; जो लिख सकता है, वह अपने दर्द को शब्द दे देता है। मगर उस बेबस, निस्तब्ध जगत का क्या, जिसकी भाषा केवल सजल आंखें और निरीह कराह है? समाज की सच्ची परीक्षा इस बात से नहीं होती कि वह अपने जैसे बोलने वालों के प्रति कितना उदार है, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह उस मौन के प्रति कितना जवाबदेह है जो अपनी व्यथा को शब्द नहीं दे सकता।
राजसमंद के घोड़ाघाटी क्षेत्र की पथरीली जमीन पर जब एक सड़क हादसे ने एक गोमाता का अगला बायां पैर छीन लिया था, तब वह सिर्फ एक मूक पशु का शारीरिक नुकसान नहीं था; वह गति, स्वाभिमान और जीवन के सहज प्रवाह का असमय थम जाना था। हमारे समाज में ‘गौसेवा’ के नारों की कमी नहीं है, मगर नारों और जमीनी संवेदनशीलता के बीच का फासला अक्सर बहुत चौड़ा होता है। उस फासले को पाटने का काम किया उदयपुर के नारायण सेवा संस्थान ने, जिसने यह साबित किया कि जब आधुनिक विज्ञान के हाथ में करुणा का संबल हो, तो हताशा के छोर पर खड़े जीवन को भी दोबारा दौड़ाया जा सकता है।
जब औपचारिकता से परे जाकर जागी संवेदना
घटना की जानकारी मिलते ही संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने इसे महज एक सामान्य दुर्घटना की तरह नहीं देखा। त्वरित संज्ञान लेते हुए उन्होंने संस्थान के प्रोस्थेटिक्स एंड ऑर्थोटिक्स (P&O) विभाग के विशेषज्ञों को सीधे मौके पर भेजा।
यह कोई कागजी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक बेजुबान के शारीरिक और मानसिक संत्रास को समझने की गंभीर कोशिश थी। चिकित्सकों की टीम ने गोमाता के कटे हुए अंग की त्वचा, मांसपेशियों की क्षमता और भारी-भरकम शरीर के भार संतुलन का वैज्ञानिक अध्ययन किया। मूक प्राणी के शरीर पर कृत्रिम अंग का ढांचा बैठाना केवल यांत्रिक कौशल नहीं, बल्कि जीवविज्ञान और धैर्य का साझा इम्तिहान होता है।
विज्ञान जब सेवा का औजार बना
पीएंडओ विभाग की प्रमुख डॉ. मानस रंजन साहू के नेतृत्व में संस्थान की कार्यशाला में एक नई साधना शुरू हुई। लक्ष्य केवल एक कृत्रिम पैर बनाना नहीं था, बल्कि ऐसा ‘मॉड्यूलर नारायण आर्टिफिशियल लिंब’ तैयार करना था जो गोमाता के वजन को संभाल सके, झटकों को सोख सके और उसे स्वाभाविक गति दे सके। उन्नत सामग्री, सटीक माप और शॉक-एब्जॉर्बिंग तकनीक के जरिए वह अंग तैयार हुआ जिसने तकनीकी विशेषज्ञता को एक पवित्र उद्देश्य से जोड़ दिया।
उस मौन कदम में थी जीवन की वापसी
कृत्रिम अंग लेकर जब विशेषज्ञ दोबारा घोड़ाघाटी पहुंचे और अत्यंत सावधानी से उसका प्रत्यारोपण किया गया, तो वहां सिर्फ एक तकनीकी प्रयोग नहीं चल रहा था; वहां एक जीवन अपनी खोई हुई धरती को दोबारा नापने की तैयारी में था।
सहारे के साथ जैसे ही गोमाता को खड़ा किया गया, उसने कुछ पलों की हिचकिचाहट के बाद संतुलन साधा और आत्मविश्वास के साथ अगला कदम बढ़ाया। धूल भरी जमीन पर पड़ा वह पहला कृत्रिम कदम वहां खड़े ग्रामीणों और सेवाभावी लोगों की आंखों में आंसू और होठों पर सुकून की मुस्कान छोड़ गया। जो जीव कल तक लाचार होकर जमीन पर पड़ा था, वह आज अपने पैरों पर स्वावलंबन से खड़ा था।
संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल के वे शब्द समाज के अंतर्मन को झकझोरने वाले हैं कि—इंसान तो अपनी व्यथा शब्दों में कह लेता है, लेकिन बेजुबान के दर्द को महसूस करने के लिए संवेदनशील हृदय की दरकार होती है।
यह घटना हमारे समय के सामने एक बड़ा सबक रखती है: तकनीक का असली वैभव इमारतों, मशीनों या मुनाफे में नहीं है; तकनीक की सार्थकता तब है जब वह किसी लाचार के आंसुओं को पोंछ सके और किसी असहाय के जीवन में गति बनकर लौट सके। घोड़ाघाटी की उस सड़क पर पड़ा वह पहला कदम, वास्तव में हमारी मानवीय चेतना का एक कदम आगे बढ़ना है।
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