उदयपुर में रावण दहन : सौ फीट की सोने की लंका, पंद्रह मिनट की राख और एक बुझती हुई रात

सैयद हबीब/कमल कुमावत

उदयपुर। हमारे सिनेमा और लोक-नाटकों का यह पुराना और बेहद खूबसूरत फलसफा रहा है कि जब भी किसी मंच पर ‘सोने की लंका’ सजाई जाती है, तो दर्शक केवल उसकी भव्यता पर मुग्ध नहीं होता, बल्कि उस मुगालते को भी तौलता है जो इंसान को सोने की दीवारों के भीतर खुद को अमर समझने का वहम देता है। मंगलवार की सर्द होती शाम झीलों के शहर उदयपुर के गांधी ग्राउंड (महाराणा भूपाल स्टेडियम) में जब विजयादशमी का मेला सजा, तो वह केवल पटाखों और बारूद का शोर नहीं था; वह सदियों पुरानी उस इंसानी फितरत का आईना था, जहां अहंकार की हर मीनार को आखिरकार खाक में ही मिलना होता है।

चेतक सर्कल, हाथीपोल और कोर्ट चौराहे की गलियों से ट्रैफिक का रेला जब गांधी ग्राउंड की तरफ मुड़ा, तो शहर का हर तबका उस मैदान में खिंचा चला आया। झांकियों में सजे राम, लक्ष्मण और हनुमान के स्वरूपों को देखकर मुझे अक्सर यह ख्याल आता है कि मंच पर सजने वाले ये चेहरे हमारे रोजमर्रा के आम चेहरों जैसे ही होते हैं, लेकिन जब वे आस्था का चोला ओढ़ लेते हैं, तो पूरा शहर उनके कदमों में अपना सिर झुका देता है।

पूंछ की आग और भरभरा कर गिरता तिलिस्म

इस बार गांधी ग्राउंड के उस विशाल कैनवास पर सौ फीट लंबी ‘सोने की लंका’ का जो भव्य ढांचा खड़ा किया गया था, वह किसी बड़े बजट की ऐतिहासिक फिल्म के सेट जैसा जान पड़ता था। लेकिन इस पूरे दृश्य का सबसे जादुई और प्रतीकात्मक क्षण तब आया, जब हनुमान का स्वरूप धारण किए कलाकार ने अपनी पूंछ की लौ से उस सौ फीट की स्वर्ण-नगरी को छुआ।

पलक झपकते ही धमाकों के बीच वह सुनहरी लंका लपटों का समंदर बन गई। पंद्रह मिनट तक आसमान में गूंजते रॉकेट और सतरंगी आतिशबाजी उस जलती हुई लंका के ऊपर ऐसा मंजर बना रहे थे मानो आसमान भी उस पतन का गवाह बन रहा हो। यह दृश्य देखकर मन के किसी कोने में कौंधता है कि जिस सोने के मोह में रावण ने अपने पूरे कुल को दांव पर लगा दिया, उसे भस्म होने में पंद्रह मिनट की फुर्सत भी नहीं लगी। इंसान सारी उम्र दौलत और शोहरत की लंका तामीर करने में गंवा देता है, और एक छोटी सी चिंगारी उसके पूरे वजूद को राख का ढेर बना देती है।

सत्तर फीट का रावण और कुंभकरण की वह हिचकिचाहट

इसके बाद शुरू हुआ रावण के उस कुनबे के खात्मे का सिलसिला। भगवान राम के अग्निबाण से सत्तर फीट का रावण और पैंसठ फीट का मेघनाद धू-धू कर जल उठे। लेकिन इस तमाशे के बीच एक बड़ा दिलचस्प वाकया घटा—पैंसठ फीट का कुंभकरण जब पहली बार सुलगने लगा, तो बीच में ही उसकी आग बुझ गई; उसे दोबारा जलाना पड़ा।

यह दृश्य भले ही तकनीकी चूक रहा हो, लेकिन एक लेखक की नजर इसे जिंदगी के एक बड़े रूपक की तरह देखती है। कुंभकरण तो वैसे भी आधी नींद और आधी बेबसी का किरदार रहा है, जो जानता था कि उसका भाई गलत रास्ते पर है, फिर भी कुल की वफादारी के नाम पर मारा गया। शायद वह बुझती हुई आग उस किरदार की उस दबी हुई हिचकिचाहट का अक्स थी, जो आज के इंसान के भीतर भी है—गलत का साथ देते हुए एक पल के लिए ठिठकना, और फिर उसी व्यवस्था की आग में स्वाहा हो जाना।

मैदान में गूंजते जयकारों के बीच पंद्रह मिनट में रावण, कुंभकरण और मेघनाद के ढांचे पिघलकर जमीन पर बिछ गए। आतिशबाजी का धुआं धीरे-धीरे गांधी ग्राउंड की ठंडी हवाओं में घुलने लगा और हजारों लोग अपने-अपने घरों की ओर लौटने लगे। दशहरा खत्म हुआ, मंच वीरान हो गया। परदे के पीछे झांकें तो असली सवाल हमेशा की तरह वहीं खड़ा मुस्कुराता है—लकड़ी और सन के पुतले तो पंद्रह मिनट में जला दिए गए, लेकिन हमारे सीने में जो सोने की लंकाएं और दस सिर वाले अहंकार चुपचाप सांस ले रहे हैं, उन पर आग का तीर कौन चलाएगा?

 

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