उदयसागर की छाती पर कंक्रीट का खंजर और आतिशबाजी का क्रूर जश्न : एक ऐतिहासिक झील के विलाप पर कॉरपोरेट मुनाफे की दिवाली

सैयद हबीब, उदयपुर।

झीलें जब चुप होती हैं, तो इसका मतलब यह नहीं होता कि वे अपनी हत्या पर सहमत हैं। वे दरअसल उस निर्लज्ज तमाशे को देख रही होती हैं, जो विकास और आधुनिक पर्यटन के मुखौटे में उनकी ही कब्र पर रचा जाता है। उदयपुर का उदयसागर इन दिनों इसी मौन चीत्कार से गुजर रहा है। जिस झील को सदियों पहले जल-संस्कृति, प्रकृति के संतुलन और मेवाड़ की प्यास बुझाने के लिए रचा गया था, आज उसी झील का सीना चीरकर, उसके बहाव क्षेत्र और पर्यावरण की रीढ़ तोड़कर खड़े किए गए एक सात सितारा रिज़ॉर्ट में जश्न की मुनादी पीटी जा रही है।

आगामी दिवाली, क्रिसमस और नए साल के नाम पर ‘रैफल्स रिसॉर्ट’ ने विलासिता के जो पैकेज बेचे हैं, वे दरअसल किसी होटल का प्रचार नहीं, बल्कि कुदरत के सीने पर नाचे जा रहे बेपरवाह नंगे नाच का घोषणापत्र हैं।

कुदरत के जख्मों पर ₹85,000 की रात और बारूद का तमाशा

अरावली की पहाड़ियों की जड़ों को खोदकर और उदयसागर के 21 एकड़ निजी द्वीप पर कब्जा जमाकर खड़े किए गए इस 137 कमरों वाले विशालकाय कंक्रीट के महल में 8 नवंबर की रात बारूद सुलगेगा। दावा किया गया है कि झील के ऊपर ‘भव्य आतिशबाजी’ होगी।

सोचिए, उस शांत झील के पानी में बारूद का जहर घुलेगा, रात के सन्नाटे में परिंदों के घोंसले उजड़ेंगे और जलीय जीवन दम तोड़ेगा—सिर्फ इसलिए ताकि प्रति रात ₹78,000 से ₹85,000 लुटाने वाले कॉरपोरेट कुलीन वर्ग को ‘द रैफल्स एक्सपीरियंस’ का भ्रम बेचा जा सके। जो झील प्रदूषण और घटते जलस्तर से पहले ही कराह रही है, उसकी सिसकियों पर ₹22,000 प्रति प्लेट वाले गाला डिनर के ठहाके गूंजेंगे। इसे जश्न नहीं, बल्कि उदयपुर की नैसर्गिक आत्मा और यहां के नागरिकों के घावों पर छिड़का जा रहा शुद्ध नमक ही कहा जा सकता है।

किसकी कीमत पर यह ‘सीजन ऑफ सेलिब्रेशन’?

होटल के प्रचार तंत्र ने बड़ी बेशर्मी से गिनाया है कि कैसे झील किनारे पारंपरिक शाम की ‘आरती’ और राजस्थानी लोकगीतों के तमाशे बेचे जाएंगे। यह हमारी उस लोक-संस्कृति का सबसे फूहड़ बाजारीकरण है, जो जल को देवता मानती आई है।

पारिस्थितिकी का विनाश: जिस टापू और वेटलैंड पर कभी जैव विविधता का बसेरा था, उसे पाटकर यूरोपियन और इंडो-सारसेनिक शैली के कृत्रिम बगीचे उगा दिए गए।

जवाबदेही से परे व्यवस्था: पर्यावरण नियमों, झीलों के संरक्षण कानूनों और सुप्रीम कोर्ट के संवेदनशील जलक्षेत्रों संबंधी आदेशों को फाइलों के नीचे दबाकर इस निर्माण को हरी झंडी कैसे मिली, यह सवाल आज भी हवा में तैर रहा है।

स्थानीय जनता की बेबसी: शहर का आम नागरिक पेयजल संकट और जलभराव की दोहरी मार झेलता है, जबकि वैश्विक पूंजीपति झीलों के द्वीप खरीदकर आम जनता के लिए उसके ही जलस्रोतों पर ‘नो एंट्री’ के बोर्ड लगा देते हैं।

मुनाफे की भूख और व्यवस्था का अंधापन

दिसंबर की कंपकपाती रातों में जब क्रिसमस ईव और न्यू ईयर के नाम पर अंतरराष्ट्रीय शराब और कानफोड़ू संगीत का दौर चलेगा, तब झील के किनारे खड़ा उदयपुर का संवेदनशील नागरिक खुद से पूछेगा कि क्या हमारी विरासत केवल अंतरराष्ट्रीय होटल श्रृंखलाओं के मुनाफे का चारा बनने के लिए रह गई है?

जब हुकूमतें झीलों को बेचने लगें और कानून रसूखदारों के आगे नतमस्तक हो जाए, तब उदयसागर की लहरों पर आतिशबाजी का चमकना दरअसल रोशनी का नहीं, हमारे सामूहिक नैतिक पतन का अंधेरा है। यह जश्न उदयपुर का नहीं है, यह तो एक मरती हुई झील के कफन पर फेंके गए चंद विदेशी सिक्कों की खनक भर है।

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