आसमान से झांकती रौशनी की एक मुकम्मल नज़्म : जब फोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत की नज़र ने मेले को पंख लगा दिए

सैयद हबीब, उदयपुर

रात ने जब उदयपुर के कांधे पर अपना सर रखा, तो अंधेरा कहीं खो सा गया… ज़मीन पर एक पूरा कहकशां उतर आया था। नगर निगम के टाउनहॉल प्रांगण में इन दिनों दीपावली मेला नहीं लगा है, गोया खुशियों की एक पूरी बस्ती आ बसी है। दूर से देखो तो लगता है जैसे किसी ने आसमान के तारे समेटकर मिट्टी के आंचल में बिखेर दिए हों।

और इस बिखरी हुई रौशनी को, इस थिरकती हुई भीड़ को जब ज़मीन से नहीं, बादलों की ओट से देखना चाहा… तो हमारे फ़ोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत ने आसमान में एक आंख भेज दी। उनके ड्रोन के कैमरे ने जब परिंदे की तरह परवाज़ भरी, तो टाउनहॉल का पूरा मंज़र एक जादुई ख़्वाब बनकर लेंस में उतर आया।

वीडियो में इन तस्वीरों को जरूर देखिए आपको मेले के रंग दिखाई देंगे

ऊपर से देखने पर यह महज़ इमारतों और दीयों का मेल नहीं था। कमल के कैमरे की नज़र से वह ऐतिहासिक टाउनहॉल दूधिया और नीली रौशनी में नहाया हुआ एक मखमली ताज जैसा जगमगा रहा था। उसके दालानों और छतों पर जलती लड़ियां, और ठीक उसके पैरों में फैला इंसानों का एक बहता हुआ दरिया—जहाँ हर चेहरा रौशनी का एक कतरा बना हुआ था।

नीचे मेले के आंगन में ज़िंदगी अपनी पूरी रफ़्तार से हंस रही थी। कहीं सांस्कृतिक संध्या के मंच से उठते सुरों पर धड़कते हुए नौजवानों के दिल थे, तो कहीं झूलों की ऊंचाइयों पर बच्चों की खिलखिलाहटें हवा के साथ झूल रही थीं। महिलाओं के हाथों में खनकती चूड़ियां, छोटी-बड़ी दुकानों पर सजी उम्मीदों की चमक, और मोल-भाव के बीच छूटती मीठी हंसी… छोटे से ठेले से लेकर बड़े स्टॉलों तक, हर कोई त्योहार के इस मेले में अपनी ज़िंदगी का एक टुकड़ा जोड़ रहा था।

ज़मीन पर चलते हुए हम सिर्फ़ अपने क़दमों की आहट सुनते हैं, लेकिन जब कमल कुमावत ने आसमान से इस पूरे मंज़र को एक फ्रेम में बांधा, तो समझ आया कि शहर जब एक साथ मुस्कुराता है, तो कैसा दिखता है। रौशनी के उस विहंगम समंदर में टाउनहॉल ऐसे चमक रहा था मानो कह रहा हो—”दीपावली सिर्फ़ एक दिन का त्योहार नहीं, जब दिल मिल जाएं तो हर रात चिराग़ों की होती है।”

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