सुरों की नदी में बहता एक शहर: जब पलक मुच्छल की आवाज़ ने उदयपुर की रात को एक मुकम्मल नज़्म बना दिया

फोटो एंड वीडियो : कमल कुमावत

सैयद हबीब, उदयपुर

कुछ शामें कैलेंडर की तारीख़ों से बाहर निकलकर सीधे लोगों के सीनों में दर्ज हो जाती हैं। शुक्रवार की शाम उदयपुर के टाउन हॉल का वह मुहावरा थी, जहां सिर्फ एक मेला नहीं लगा था, बल्कि सुरों का एक आबशार फूट पड़ा था। नगर निगम उदयपुर द्वारा आयोजित दीपावली मेला 2026 की तीसरी रात जब ढली, तो वहां हवा में सिर्फ त्योहार की रोशनी नहीं थी, वहाँ पार्श्वगायिका पलक मुच्छल की आवाज़ की रेशमी नमी थी, जिसने एक पूरे शहर को देर रात तक सुर और सुकून के दरमियान थामे रखा।

यह कोई मामूली जलसा नहीं था। पांडाल अपने वक़्त से बहुत पहले ही इंसानी समंदर में तब्दील हो चुका था। जब किसी शहर में सुरों की शिनाख़्त गहरी होती है, तो कुर्सियों की गिनती बेमानी हो जाती है; लोग जहाँ जगह मिली, वहीं दिल थामकर बैठ गए।

दीपों की लौ और मंच का औपचारिक उजाला

हर बड़ी महफ़िल की तरह इस शाम ने भी अपनी शुरुआत परम्परा के साए में की। विघ्न विनाशक गजानन और मां सरस्वती की प्रतिमा के सामने जब दीप प्रज्वलित हुआ, तो रोशनी के साथ-साथ एक साझा अपनायत मंच पर साकार हुई। मेला संयोजक प्रमोद सामर की अगुवाई में इस उजाले के साझीदार बने नगर निगम महापौर पारस सिंघवी, विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र सिंह राठौड़, जिला कलेक्टर गौरव अग्रवाल, निगम व यूडीए कमिश्नर अभिषेक खन्ना, पुलिस अधीक्षक अमृता दुहन, भाजपा राजस्थान के प्रदेश उपाध्यक्ष नाहर सिंह जोधा, आर.एन.टी. मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. राहुल जैन, दैनिक भास्कर के संपादक नवल सक्सेना, समाजसेवी गुरप्रीत सोनी, यूआईटी आबूरोड के पूर्व अध्यक्ष सुरेश कोठारी, समाजसेवी खुबीलाल मेनारिया, समाजसेवी राजीव सुहालका, शिक्षाविद् एवं आलोक संस्थान के निदेशक प्रदीप कुमावत, समाजसेवी विनोद दलाल, समाजसेवी जानकी लाल मूंदड़ा, समाजसेवी रविकांत त्रिपाठी, मेवाड़ क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष पृथ्वीराज चौहान, साहू समाज के अध्यक्ष लालेश साहू, सालवी समाज के अध्यक्ष सोहन लाल सालवी, समाजसेवी अमृत मेनारिया और समाजसेवी रणजीत सिंह दिगपाल।

अंजन गुहा की पेशबंदी और फिर पलक की जादुई आमद

शाम का पर्दा सबसे पहले इंडियन आइडल फेम अंजन गुहा ने उठाया। उन्होंने अपनी धारदार और लयबद्ध प्रस्तुतियों से नौजवानों की नब्ज़ को पकड़ा और महफ़िल की ज़मीन तैयार की।

और फिर, जब पलक मुच्छल ने मंच की सीढ़ियों पर क़दम रखा, तो टाउन हॉल तालियों और हूटिंग के एक ऐसे तूफ़ान से भर गया जिसकी गूँज दूर तक सुनी जा सकती थी। पलक की गायकी की सबसे बड़ी ख़ासियत यही है कि वे आवाज़ की बाज़ीगरी से ज़्यादा जज़्बात के धागे बुनती हैं। जब उन्होंने अपनी रेशमी आवाज़ में ‘कौन तुझे यूं प्यार करेगा’ की पहली तान छेड़ी, तो लगा जैसे हर सुनने वाले ने अपने-अपने हिस्से का अकेलापन और अपनी मोहब्बत उस आवाज़ में रख दी हो।

इसके बाद तो नगमों का एक अंतहीन सिलसिला था। ‘आशिकी-2’ का पुरकशिश नगमा ‘चाहूं मैं या ना’ और ‘मेरी आशिकी’, फिर ‘सनम तेरी कसम’ का रूहानी ‘तेरे संग यारा’… हर गीत के साथ श्रोता सिर्फ़ सुन नहीं रहे थे, बल्कि पलक के सुरों के साथ-साथ गा रहे थे।

महफ़िल में जज़्बातों का रंग उस वक़्त और गहरा हो गया जब पलक ने रेशमा के अमर नगमे ‘लंबी जुदाई’ को अपने ख़ास, संजीदा अंदाज़ में छेड़ा। जुदाई के उस दर्द ने पूरे माहौल में एक सन्नाटा और कशिश घोल दी। लेकिन अगले ही पल उन्होंने सूफ़ी रंग में रंगे ‘मेरे रश्क-ए-क़मर’ को जिस पुरजोश और दिलकश अंदाज़ में पेश किया, उसने पांडाल को फिर से थिरकने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद ‘जुम्मे की रात’, ‘लापता’ और ‘प्रेम रतन धन पायो’ की धुनें गूंजीं। युवाओं का जोश अपनी हदों को छू रहा था, पाँव ज़मीन पर थिरक रहे थे और मोबाइल की स्क्रीनें उस सुरीले तिलिस्म को अपनी मुट्ठी में क़ैद करने के लिए जल रही थीं।

एक आवाज़ जो रूह को छूती है

पलक मुच्छल की कामयाबी दरअसल किसी शोर की नहीं, बल्कि उनके सुरों की सादगी और ठहराव की दास्तान है। ‘किक’, ‘एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’, ‘बागी-2’ और ‘काबिल’ जैसी फिल्मों के ज़रिए उन्होंने मुल्क को समझाया है कि रूमानी नगमों में जब तक साफ़गोई न हो, तब तक वे सदियों का सफ़र तय नहीं कर सकते। उदयपुर की इस रात ने एक बार फिर तस्दीक़ की कि जब कोई फ़नकार दिल से गाता है, तो महफ़िल का दायरा महज़ मंच तक महदूद नहीं रहता, वह लोगों के भीतर उतर जाता है।

आज की शाम: शहर की अपनी माटी और अपने कलाकारों के नाम

मेला संयोजक प्रमोद सामर ने बताया कि जुमे की इस सितारों भरी रात के बाद, शनिवार की शाम उदयपुर की अपनी ज़मीनी प्रतिभाओं को समर्पित होगी। नगर निगम का यह विशाल मंच शहर की उभरती हुई आवाज़ों, नर्तकों और स्थानीय फनकारों के लिए खुलेगा। यह इस बात का पैगाम है कि कला सिर्फ़ दूर के आसमान से नहीं चमकती, वह हमारी अपनी गलियों और बस्तियों से भी फूटती है।

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