जब ज़िन्दगी से हारकर मौत की आगोश में कूद पड़ा इंसान, तब फ़रिश्ता बनकर पानी में उतरा जवान; गणगौर घाट पर थमी मौत की आहट

उदयपुर। कभी-कभी कोई इंसान अपने भीतर इतना टूट जाता है कि उसे दुनिया की तमाम रोशनियों के बीच सिर्फ़ गहरा अंधेरा ही नज़र आता है। शनिवार की दोपहर उदयपुर के गणगौर घाट पर भी ऐसा ही एक मंज़र थमा था—जहाँ एक शख़्स ज़िन्दगी के सफ़र से इस क़दर थक चुका था कि उसने मौत को गले लगाने के लिए झील की अतल गहराइयों को चुन लिया। लेकिन नियति ने उस बेबस इंसान के लिए एक रखवाले को पहले से तैनात कर रखा था। नागरिक सुरक्षा विभाग के जवान गौरव बागोरा की रूहानी तत्परता ने साबित कर दिया कि जब तक इंसानियत ज़िंदा है, उम्मीद की कोई न कोई किरण ज़रूर बची रहती है।

मछलियों को दाना डालते हाथ… और ज़िन्दगी बचाने की पुकार

शनिवार दोपहर क़रीब 3 बजे का वक़्त था। दाई जी की पुलिया के पास जवान गौरव बागोरा रोज़ाना की तरह शांत भाव से मछलियों को दाना डाल रहे थे। पानी की सतह पर लहरें बन और बिगड़ रही थीं। तभी अचानक उनकी नज़र पास ही खड़े एक व्यक्ति पर पड़ी, जिसने बिना कुछ सोचे-समझे गणगौर घाट की तरफ़ ठहरे हुए गहरे पानी में छलांग लगा दी।

उस पल मौत और ज़िन्दगी के बीच महज़ चंद पलों का फ़ासला था। गौरव ने न अपनी जान की परवाह की, न कोई हिचकिचाहट दिखाई; उन्होंने बिना एक लम्हा गँवाए उस डूबती साँस के पीछे पानी में छलांग लगा दी।

पानी की गहराइयों से उस अचेत इंसान को अपने सीने से लगाकर खींचते हुए गौरव जब किनारे तक लाए, तो स्थानीय लोगों के हाथ भी मदद के लिए आगे बढ़े। किनारे पर पड़ा वह बेजान सा जिस्म चीख-चीख कर कह रहा था कि दर्द जब हद से गुज़र जाता है, तो इंसान जीने की चाहत छोड़ देता है।

‘भाई अब जाने का वक़्त आ गया है…’ मोबाइल में सिमटा आख़िरी दर्द

पानी से बाहर निकालने के बाद जब उस व्यक्ति के भीगे हुए सामान की पड़ताल हुई, तो वहाँ दर्द की एक ऐसी दास्तान सामने आई जिसने हर आँख नम कर दी। उसके मोबाइल में चंद मिनट पहले अपने सबसे अज़ीज़ दोस्त को भेजा गया एक आख़िरी पैगाम चमक रहा था:

“भाई, अब जाने का वक़्त आ गया है…”

वह चंद लफ़्ज़ नहीं, बल्कि किसी इंसान के भीतर दबे टूटे हुए ख़्वाबों, बेबसी और अकेलेपन की आख़िरी चीख़ थे। पर्स में रखे ड्राइविंग लाइसेंस से उसकी शिनाख़्त की कोशिशें शुरू हुईं, ताकि उन अपनों को ख़बर की जा सके जो शायद घर पर उसके लौटने की राह देख रहे होंगे।

आईसीयू में चलती सांसें और इंसानियत की जीत

गौरव बागोरा ने केवल उसे पानी से नहीं निकाला, बल्कि एक सजग संरक्षक की तरह तुरंत उसे इमरजेंसी हॉस्पिटल पहुंचाया। डॉक्टरों ने हालत की नज़ाकत को देखते हुए उसे फ़ौरन आईसीयू (ICU) में भर्ती किया, जहाँ मशीनों की धीमी आवाज़ के बीच अब उसकी साँसें फिर से ज़िन्दगी से जुड़ रही हैं।

समय पर मिली इस नई ज़िन्दगी के पीछे जवान की हिम्मत थी। आज पूरे शहर की ज़ुबान पर गौरव बागोरा का नाम है, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि वर्दी सिर्फ़ ड्यूटी नहीं होती, वह किसी डूबते हुए इंसान के लिए ईश्वर का हाथ भी बन सकती है।

 

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