फोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत कैमरे व कलम से

कैमरे की उस एक नज़र ने,
गहरा सच दिखलाया है,
हज़ार अल्फ़ाज़ों से भारी,
इक मंज़र छलकाया है।
कमल कुमावत के लेंस ने,
जो तस्वीरें क़ैद करीं,
उनमें जीत का शोर भी था,
और भीतर की मौन झड़ी।
कहीं गुलाल के लाल रंग में,
भावुक सा कोई चेहरा था,
बीते कल के ज़ख्मों पर,
आज आंसुओं का पहरा था।
सपना जब सच बनकर डोला,
आँखें भर-भर आती थीं,
सालों की घुटन भरी सिसकी,
मुस्कानों में खो जाती थी।

पर ठहर ज़रा, इन तस्वीरों में,
इक और कहानी ज़िंदा है,
सियासत के इस खेल-तमाशे में,
ज़मीर कहीं शर्मिंदा है।
चेहरों के इस मेले में,
विपक्षी भी मुस्काते थे,
जो कल तक थे बाड़ेबंदी में,
आज गले मिलने आते थे।
हाथ मिलाते, झुकते चेहरे,
पढ़ सको तो पढ़ लेना,
किस चेहरे पर क्या लिखा है,
नज़रों से ही गढ़ लेना।
कोई हार के भी खुश दिखता,
कोई अंदर से हारा था,
किसने किसको वोट दिया,
यह आँखों का इशारा था।

जश्न की इन तस्वीरों में,
सौ-सौ राज़ समाए हैं,
अपनों के खंजर हैं शामिल,
गैरों के साए हैं।
तस्वीरें चुप रह कर भी,
हर इक सच कह जाती हैं,
सियासत के गहरे पर्दों को,
बेनक़ाब कर जाती हैं!
यहां देखिए और तस्वीरें















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