पर्दे के पीछे: कोई तो तिलिस्म था, जिसने पारस को पारस बना दिया

सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर

फ़िल्मों की दुनिया में जब किसी पुराने शहंशाह का दौर ढलने लगता है, तो अचानक बैकग्राउंड म्यूज़िक बदल जाता है। कैमरे का फोकस उस किनारे खड़े सह-कलाकार पर चला जाता है जिसे कभी मुख्य नायक की परछाईं माना जाता था। उदयपुर की इस सियासी फ़िल्म का ‘प्लॉट’ भी किसी मंझे हुए पटकथा लेखक की कल्पना से कम नहीं है। झील किनारे बसे इस खूबसूरत शहर में महलों की दीवारों से छनकर जो हवा आ रही थी, वह किसी को सत्ता के अर्श से फर्श पर ला रही थी, तो किसी बागी को सीधे ताज पहना रही थी।

ज़रा उस सीन को याद कीजिए जब गुलाबचंद कटारिया साहब का फ़रमान मेवाड़ में पत्थर की लकीर हुआ करता था। 2023 के विधानसभा चुनाव में जब कटारिया के वफ़ादार ताराचंद जैन को टिकट मिला, तो पारस सिंघवी की आँखों से जो दर्द छलका था, वह सिर्फ़ एक टिकट कटने का गम नहीं था; वह उस घुटन की बगावत थी जो बरसों से अनुशासन के मुखौटे के पीछे सुबक रही थी। तब किसी ने नहीं सोचा था कि कभी सिसकियों के साथ बगावती तेवर दिखाने वाला यह किरदार आगे चलकर क्लाइमेक्स का असल हीरो साबित होगा।

कटारिया साहब चंडीगढ़ के राजभवन की शांत चारदीवारी तक सीमित क्या हुए, उदयपुर के ‘स्टूडियो’ में कैमरों के एंगल ही बदल गए। गजपाल सिंह राठौड़ की जिलाध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी महज़ एक नियुक्ति नहीं थी; वह मेवाड़ के उस पुराने किले पर नए सेनापतियों का कब्ज़ा था, जो कटारिया की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हुआ था। इस पूरी सियासी ड्रामेबाज़ी में प्रमोद सामर वह मूक सूत्रधार थे, जिन्होंने पर्दे के पीछे बैठकर डायलॉग्स तय किए। जब संगठन की लगाम पुराने दरबार के हाथों से फिसली, तो पारस सिंघवी ने हवा का रुख पहचान लिया। वे संगठन महामंत्री बने और गजपाल सिंह-प्रमोद सामर के साथ मिलकर वह ‘त्रिमूर्ति’ तैयार हुई, जिसने पुराने वफ़ादारों के पाँव तले से ज़मीन खींच ली।

फिर आई ‘उदयपुर फाइल्स’। वो रहस्यमयी फाइलें, जिनकी फुसफुसाहट उदयपुर के चौराहों से लेकर जयपुर के सत्ता के गलियारों और दिल्ली के 7-रेसकोर्स तक गूंज रही थी। राजनीति में कुछ फाइलें बंद रहकर भी कितना गहरा असर करती हैं, यह कोई अनुभवी राजनेता ही समझ सकता है।

लेकिन असल सिनेमा तो नगर निगम के टिकट बंटवारे और मेयर की कुर्सी की दौड़ में शुरू हुआ। सामान्य सीट की घोषणा होते ही पारस ने अपने पत्ते फेंकने शुरू किए। अब ज़रा मुकाबले की कास्टिंग देखिए—सामने प्रमोद सामर खुद थे, संगठन के दिग्गज दिनेश भट्ट थे, पूर्व डिप्टी मेयर महेंद्र सिंह शेखावत थे, और कटारिया साहब के रिश्तेदार अतुल चंडालिया और आकाश वागरेचा जैसे कद्दावर चेहरे भी मैदान में खड़े थे। ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है कि वो कौन सा तिलिस्म था, कौन सा अदृश्य हाथ था, जिसने इन तमाम सूरमाओं को एक झटके में किनारे कर दिया? जिलाध्यक्ष और प्रभारी सिर्फ़ एक ही नाम पर कैसे नतमस्तक हो गए?

काबिलियत की बात करें तो पारस कोई नौसिखिया नहीं थे। चार बार के पार्षद, गैराज से लेकर निर्माण समिति तक का लंबा अनुभव, उप-महापौर की कुर्सी और शहर के बाज़ार से लेकर हर चौखट तक अपनी निजी पकड़। वे जानते थे कि ताले की चाबी कहाँ छिपकर बैठती है।

और सोमवार को जब आखिरी दृश्य शूट हुआ, तो पूरा हॉल सन्न रह गया। 80 के सदन में भाजपा के पास काग़ज़ों पर 53 पार्षद थे, लेकिन जब बक्से से वोट निकले तो पारस के नाम के आगे 55 का अंक दर्ज था। दो वोट उन लोगों ने भी चुपके से दे दिए जो परदे पर विरोधी बने बैठे थे।

सिनेमा का पर्दा गिर चुका है, टाइटल्स चल रहे हैं और पारस सिंघवी अब उदयपुर के नए ‘महापौर’ हैं। लेकिन दर्शकों के ज़हन में यह सवाल हमेशा तैरता रहेगा कि उस बंद कमरे में ऐसा क्या घटा था, वो कौन सी अनकही डील थी, जिसने कभी बागी होकर उप-महापौर का पद ठुकरा देने वाले इंसान को सीधे शहर के सबसे बड़े सिंहासन पर ला बिठाया? राजनीति के इस कैनवास पर कुछ रंग ऐसे होते हैं साहब, जो केवल जीतने वाले की मुस्कान में ही दिखाई देते हैं, दस्तावेज़ों में कभी नहीं।

 

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सियासी सफर : सीढ़ी-दर-सीढ़ी गैराज से मेयर तक

पारस सिंघवी का निगम का सफर ज़मीनी और संगठनात्मक पकड़ का उदाहरण है। वे पांचवीं बार पार्षद चुनकर आए हैं:

1994-1999: पहली बार वार्ड 48 से पार्षद बनकर गैराज समिति के अध्यक्ष रहे।

2009-2014: वार्ड 50 से पार्षद चुने गए और स्वास्थ्य समिति की कमान संभाली।

2014-2019: वार्ड 41 से निर्वाचित होकर निर्माण समिति के अध्यक्ष बने।

2019-2024: वार्ड 51 से पार्षद बने और उप-महापौर (डिप्टी मेयर) का दायित्व निभाया।

सितंबर 2026: वार्ड 24 से रिकॉर्ड 1,680 मतों के भारी अंतर से पांचवीं बार पार्षद बने और अब सीधे महापौर की कुर्सी पर पहुंचे।

कारसेवक से सफल उद्योगपति तक का व्यक्तित्व

संघ व छात्र राजनीति: 10 मई 1964 को जन्मे सिंघवी आरएसएस के द्वितीय वर्ष प्रशिक्षित स्वयंसेवक हैं। 1987 में श्रमजीवी कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे और राम मंदिर आंदोलन के दौरान लखनऊ से अयोध्या तक पैदल यात्रा कर चुके हैं।

व्यापार व समाजसेवा: वे उदयप

ुर के प्रमुख होटल व ट्रेवल्स कारोबारी हैं। ‘उदयपुर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री’ (UCCI) के रिकॉर्ड 6 बार अध्यक्ष रहे हैं और दिगंबर जैन नरसिंहपुरा समाज के अध्यक्ष के रूप में भी सक्रिय हैं।

पद संभालते ही प्राथमिकताएं: “उदयपुर को बनाएंगे इंदौर जैसा”

मेयर निर्वाचित होने के बाद पारस सिंघवी ने शहर के विकास का रोडमैप साझा किया-झीलें और विरासत संरक्षण: पूर्वजों और महाराणाओं से विरासत में मिले इस शहर को नया बसाने के बजाय झीलों के संरक्षण और शहर के मूल सौंदर्य को निखारने पर ज़ोर रहेगा।

स्वच्छता मिशन: “उदयपुर किसी भी सूरत में गंदा नहीं रहेगा। स्वच्छता सर्वेक्षण में उदयपुर को देश के सबसे स्वच्छ शहर ‘इंदौर’ जैसा परिणाम दिलाने के लिए 24 घंटे काम करेंगे।”

पेयजल और पर्यटन: शहर में पेयजल संकट के स्थायी समाधान के लिए योजना बनेगी। पर्यटकों को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।

राजनीतिक संकल्प: उन्होंने कहा कि 80 पार्षदों को साथ लेकर चलेंगे, लेकिन काम के दम पर आने वाले 5 सालों में नगर निगम को ‘कांग्रेस मुक्त’ बनाने का लक्ष्य रहेगा।

 

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