उदयपुर में नगर निगम का दोहरा रंग : गैराज में कबाड़ बनते वाहनों पर महापौर नाराज, सड़कों पर अवैध पटाखा दुकानों पर चला डंडा

उदयपुर। हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था का चरित्र भी बड़ा विचित्र है। बाहर अनुशासन का डंडा बजाना जितना आसान होता है, अपने गिरेबान में झांककर आंतरिक व्यवस्था को दुरुस्त रखना उतना ही कठिन। उदयपुर की नगर सत्ता इन दिनों इसी दोहरे सच से रूबरू हो रही है। एक तरफ शहर के प्रथम नागरिक महापौर पारस सिंघवी को अपने ही मातहत गैराज में जाकर अफसोस जताना पड़ रहा है, तो दूसरी तरफ निगम का अमला दीपोत्सव की आड़ में सड़कों को घेरने वाले अवैध पटाखा कारोबारियों पर कानूनी चाबुक चला रहा है।

सवाल यह है कि जो नगर तंत्र अपने बुनियादी संसाधनों की सुध नहीं रख सकता, वह जनसेवा का दावा किस नैतिक बल पर करेगा?

महापौर पारस सिंघवी जब अशोक नगर स्थित निगम के गैराज में औचक पहुंचे, तो वहां का दृश्य आंखें खोलने वाला था। चारों तरफ पसरी गंदगी और कबाड़ बनती गाड़ियां हमारे सरकारी निकम्मेपन की कहानी कह रही थीं। कचरा ढोने और सीवरेज साफ करने वाले जरूरी वाहन महीनों से कलपुर्जों (पार्ट्स) के अभाव में खड़े-खड़े सड़ रहे हैं। जब शहर के नालों और सीवरेज में उफान आता है, तब यह तंत्र लाचार नजर आता है। महापौर ने अधीक्षण अभियंता लखनलाल बेरवा और सहायक अभियंता विजय सिंह चौहान को कड़ी फटकार लगाई और तत्काल मरम्मत के निर्देश दिए, लेकिन यह सवाल अपनी जगह कायम है कि जब तक कोई शीर्ष नेता मौके पर न पहुंचे, तब तक हमारे अफसरों को अपनी जिम्मेदारी का बोध क्यों नहीं होता?

दूसरी तरफ, सार्वजनिक सड़कों और चौराहों पर अनुशासन कायम करने के लिए आयुक्त अभिषेक खन्ना के नेतृत्व में नगर निगम ने जो सख्त तेवर अपनाए हैं, वे निश्चय ही प्रशंसनीय हैं। त्योहारों के नाम पर सार्वजनिक सड़कों को घेरकर निजी मुनाफा कमाने की बीमारी पूरे देश में आम हो चुकी है। सुभाष चौराहा, रामपुरा और ब्रह्मपोल जैसे व्यस्त इलाकों में दुकानदारों ने सैकड़ों वर्गफीट सड़कों पर टेंट गाड़कर बारूद की दुकानें सजा रखी थीं। निगम की टीम ने पुलिस बल के साथ मिलकर इन अवैध तंबू-कनात को उखाड़ा और 52 बॉक्स पटाखे जब्त किए।

राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009 की धारा 245 के तहत तीन साल की कैद और जुर्माने का प्रावधान सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं होना चाहिए। त्योहार खुशियों का पैगाम लाते हैं, अराजकता और जानलेवा हादसों का नहीं। सड़क आम नागरिक के चलने के लिए है, न कि किसी की निजी दुकानदारी चमकाने के लिए।

निगम की यह सख्ती तब तक अधूरी रहेगी जब तक वह अपने आंतरिक तंत्र को भी उतनी ही मुस्तैदी से साफ-सुथरा न बनाए। गैराज में खड़े वाहनों की मरम्मत हो और सड़कों पर कानून का राज कायम रहे—तभी झीलों की यह नगरी सचमुच एक आदर्श नागरिक समाज का रूप ले पाएगी।

 

 

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