बावर्ची : 33 वर्षों का अटूट स्वाद और ऋषिकेश मुखर्जी का ‘बावर्ची’

सैयद हबीब, उदयपुर।

 

जिंदगी का फलसफा भी अजीब है। सिनेमा के पर्दे पर जब कोई कहानी उतरती है, तो वह केवल किरदारों की नहीं होती, वह उस दौर, उस सुगंध और उस आत्मीयता की होती है जो इंसान को इंसान से जोड़ती है। वर्ष 1972 में ऋषिकेश मुखर्जी की एक क्लासिक फिल्म आई थी—’बावर्ची’। उसमें राजेश खन्ना ने ‘रघु’ का जो किरदार गढ़ा था, वह केवल रसोइये की भूमिका नहीं थी। वह बिखरे हुए रिश्तों को स्वाद, मिठास और मोहब्बत के धागे से पिरोने की एक दास्तान थी। उस फिल्म में एक बहुत मानीखेज संवाद था—”जिंदगी की सबसे बड़ी कला है दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाना और उनके दिलों तक पहुंचना।” और यह रास्ता अगर किसी लजीज पकवान की थाली से होकर गुजरे, तो वह रिश्ता पीढ़ियों तक अमर हो जाता है।

ठीक उसी तरह, झीलों की ऐतिहासिक नगरी उदयपुर के देहली गेट पर स्थित ‘बावर्ची रेस्टोरेंट’ ने अपने सफर के 33 वर्ष पूरे कर लिए हैं। 1993 में जब इस प्रतिष्ठान की पहली ईंट रखी गई होगी, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह स्थान शहर के खान-पान के नक्शे पर एक अनिवार्य मील का पत्थर बन जाएगा। सिनेमा और रसोई में एक गहरी समानता है—दोनों में ‘प्योरिटी’ (शुद्धता) और समर्पण के बिना कोई क्लासिक तैयार नहीं हो सकता।

तीन दशकों का यह सफर केवल दाल, कड़ाही और तंदूर का नहीं है, यह एक सांस्कृतिक और सामाजिक संवाद है। यहां उदयपुर के प्रशासनिक गलियारों के बड़े-बड़े अफसर आते हैं, चुनावी सियासत की थकान मिटाने राजनेता पहुंचते हैं, देश-दुनिया के कोने-कोने से आए सैलानी आते हैं और शहर का आम बाशिंदा भी उसी अपनेपन से बैठता है। सब जब यहां से उठते हैं, तो उनकी जबान पर सिर्फ स्वाद नहीं होता, बल्कि चेहरे पर एक तृप्त मुस्कान होती है। यह वही भाव है जो ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा के अंत में दर्शक थिएटर से बाहर निकलते हुए महसूस करता था।

जैसे कोई उम्दा निर्देशक अपनी पटकथा में शुद्धता, विविधता और संतुलन का ध्यान रखता है, वैसे ही बावर्ची ने पंजाबी, चीनी, इटैलियन और पारंपरिक थाली के जायकों को अपनी थाली में सजाकर एक भरोसेमंद पहचान बनाई है। 33 साल किसी रेस्टोरेंट के लिए केवल तारीखों का हिसाब नहीं होते, यह लाखों परिवारों के साथ बिताए गए वो लम्हे हैं जो तस्वीरों और स्मृतियों में दर्ज हो चुके हैं।

आज जब बावर्ची अपनी 33वीं वर्षगांठ मना रहा है, तो यह याद दिलाता है कि दुनिया चाहे कितनी भी आधुनिक और डिजिटल क्यों न हो जाए, प्रेम और शुद्धता से परोसे गए भोजन का कोई विकल्प नहीं हो सकता। ऋषिकेश दा का ‘बावर्ची’ सिनेमाई पर्दे पर घर जोड़ता था, और उदयपुर का यह ‘बावर्ची’ तीन दशकों से अपने स्वाद से दिलों को जोड़ रहा है।

 

(Visited 70 times, 70 visits today)

About Author

Leave a Reply