पर्दे के पीछे : विरासत, संस्कारों की जीत और वार्ड 33 में खिली नई धूप

सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर।

सिनेमा का वह पुराना फलसफा एक बार फिर सच साबित हुआ—किरदार वही असर छोड़ता है, जो सिर्फ संवादों से नहीं, बल्कि अपनी सादगी और जमीन की नमी से पहचाना जाता है। गुरुदत्त के फ्रेम्स की तरह सियासत के कोलाहल के बीच कभी-कभी खामोश मेहनत ही सबसे बड़ा सच बनकर उभरती है। झीलों की नगरी उदयपुर के वार्ड संख्या 33 की गलियों ने इस बार चुनावी शोर के बजाय संस्कारों और बुनियादी इंसानियत की उसी रवायत पर मुहर लगाई है। भारतीय जनता पार्टी के युवा प्रत्याशी जतिन श्रीमाली ने कांग्रेस के दीपक जैन को भारी मतों से शिकस्त देकर न केवल जीत हासिल की, बल्कि अपने परिवार की ऐतिहासिक सियासी और सामाजिक विरासत को नए मुकाम पर पहुँचा दिया।

वार्ड 33 की यह चौखट भाजपा की पारंपरिक और मजबूत जमीन रही है, जहाँ से कभी शहर विधायक ताराचंद जैन और पूर्व नगर परिषद सभापति रवींद्र श्रीमाली का दौर निकला था। मगर इस बार का मुकाबला सिर्फ दलीय निष्ठा तक सीमित नहीं था; यह स्वर्गीय प्रोफेसर विजय श्रीमाली के उस आभामंडल का इम्तिहान था, जिसे उनके पुत्र जतिन पिछले आठ वर्षों से अपने कंधों पर थामे हुए थे।

जीत के बाद छलके जज्बात: पिता के संस्कारों और सादगी को किया समर्पित

प्रचंड जीत के बाद जतिन श्रीमाली ने इस विजय को अपने पिता स्व. प्रो. विजय श्रीमाली के संस्कारों, उनकी सादगी और शहर में उनके द्वारा छोड़े गए गहरे प्रभाव को समर्पित किया। अजमेर विश्वविद्यालय के कुलपति रहे प्रो. श्रीमाली की पर्यावरण निष्ठा और कमजोर तबके के प्रति सहज संवेदना आज भी शहरवासियों के जेहन में जिंदा है। छात्र राजनीति के दौर में एबीवीपी के बैनर तले धूप में तपकर निकले और बाद में सेवा कार्यों के जरिए जरूरतमंद बच्चों तक शिक्षा के साधन पहुँचाने वाले जतिन की यह जीत उसी निरंतर सेवा का प्रतिफल मानी जा रही है।

पारिवारिक एकजुटता और रणनीतिकारों का अथाह पसीना

इस चुनाव की सबसे खूबसूरत तस्वीर पर्दे के पीछे खड़े उन अपनों की रही, जिन्होंने दिन-रात एक कर इस युवा चेहरे को मजबूती दी:

रवींद्र श्रीमाली व दीपक बोल्या की रणनीति: जतिन के ताऊजी एवं पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष रवींद्र श्रीमाली के राजनीतिक अनुभव और चुनाव संयोजक दीपक बोल्या की अथाह संगठनात्मक मेहनत ने वार्ड के एक-एक मतदाता तक सीधा संपर्क साधा।

परिवार का मजबूत संबल: फूफा जयंत ओझा, साडू भाई देवेंद्र श्रीमाली तथा भाई जयंत श्रीमाली और मयंक श्रीमाली ने चुनाव प्रचार की पूरी बागडोर संभालते हुए हर मोर्चे पर मोर्चाबंदी की।

 

मित्रों और रिश्तेदारों का समर्पण: पूरे परिवार के साथ-साथ मित्रों और रिश्तेदारों की अनथक दौड़-धूप ने वार्ड 33 में ‘जेन-जी’ मतदाताओं और वरिष्ठ नागरिकों के बीच संतुलन साधने का काम किया।

राजकपूर की फिल्म का वह फलसफा कि “दिलों में वही उतरता है जिसकी नीयत साफ हो”—वार्ड 33 के इस जनादेश में पूरी तरह जीवंत हो उठा है। यह जीत केवल एक पार्षद बनने की कवायद नहीं, बल्कि विरासत और आधुनिक दृष्टि के संगम पर जनता के अटूट भरोसे की गवाही है।

 

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