
उदयपुर। उदयपुर के मतदाताओं को बधाई कि उन्होंने नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी का सातवां ‘राजतिलक’ कर दिया है। अस्सी में से त्रेपन सीटें झोली में डाल दीं। कांग्रेस छब्बीस पर सिमट गई, तीन निर्दलीय तैर गए और एक सीट पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का लाल झंडा भी फहर गया। आंकड़े बताते हैं कि लोकतंत्र का उत्सव संपन्न हुआ, ढोल-नगाड़े बजे, मिठाइयां बंटीं और नेताओं ने अपनी पीठ खुद थपथपा ली।
लेकिन इस पूरे उत्सव के बीच असली सवाल यह है कि क्या इस जीत से झीलों की नगरी के आम बाशिंदे की किस्मत में एक कतरा भी उजाला बढ़ेगा?
कटु सत्य तो यह है कि भले ही भाजपा सातवीं बार बोर्ड बना ले, या भविष्य में सत्तरवीं बार बना ले—उदयपुर में बादल अगर सिर्फ दस मिनट भी जी भरकर बरस जाएं, तो बिजली की बत्ती पूरे एक घंटे तक गुल रहना तय है। आसमान में बिजली कड़के न कड़के, डिस्कॉम और निगम के बुनियादी ढांचे के फ्यूज जरूर उड़ जाते हैं।
इसे हमारे देश की विडंबना कहें या स्थानीय निकाय की लाचारी? पिछले तीन दशकों से एक ही दल का निर्बाध शासन है। पीढ़ियां बदल गईं, पार्षदों के चेहरे बदल गए, पर जलभराव और करंट भागने की रिवायत टस से मस नहीं हुई। चुनाव आते हैं तो स्मार्ट सिटी, पेरिस और वेनिस के सपने बेचे जाते हैं; और चुनाव बीतते ही पहली मानसूनी फुहार यह अहसास करा देती है कि व्यवस्था आज भी लालटेन युग की चौखट पर खड़ी है।
जनता भी गजब है। अंधेरे में बैठकर पसीना बहाते हुए व्यवस्था को कोसती है, मगर जब मतपेटी सामने आती है, तो उन्हीं पुराने चेहरों पर फिर मुहर लगा देती है। अब जब त्रेपन पार्षदों का भारी-भरकम लश्कर निगम की कुर्सियों पर आसीन होगा, तब देखना यह है कि क्या वे सिर्फ फीते काटने और प्रस्ताव पास करने तक सीमित रहेंगे, या शहर को उस बुनियादी जलालत से भी मुक्ति दिलाएंगे जहां हर हल्की बारिश के बाद मोमबत्ती तलाशनी पड़ती है?
राजतिलक तो हो गया साहब, अब जरा उदयपुर के तारों और खंभों पर भी दया कीजिए!
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