फोटो जर्नलिस्ट : ऋषभ जैन

सैयद हबीब, उदयपुर।
भारतीय राजनीति अब उस दौर में दाखिल हो चुकी है जहां चुनाव जीतना सिर्फ अवाम का दिल जीतना नहीं, बल्कि किसी हाई-सिक्योरिटी ज़ोन में ख़ुद को सुरक्षित क़ैद कर लेना है। उदयपुर नगर निगम के अस्सी रणबांकुरों ने ईवीएम में अपने भाग्य को सील तो कर दिया है, मगर राहत की सांस लेने के बजाय उन्हें सीधे राजनीति के सबसे आधुनिक ‘थिएटर’ यानी बाड़ेबंदी के परदे के पीछे धकेल दिया गया है।
दृश्य कल्पना कीजिए—मतदान समाप्त होते ही शहर भर में थके-हारे घूम रहे अस्सी भाजपा प्रत्याशियों को शोभागपुरा में गोलबंद किया गया। यह किसी विजय जुलूस का मंचीकरण नहीं था, बल्कि रात के ठीक ग्यारह बजे किसी अज्ञात गंतव्य की ओर रवाना होने वाली उस अज्ञात बस का सफ़र था, जिसके पहियों के नीचे लोकतंत्र की हवाइयां उड़ रही थीं। पार्टी के कुछ वयोवृद्ध चाणक्य और पहरेदार इस काफ़िले के साथ हैं। ‘मोबाइल अभी ज़ब्त होने बाकी हैं’—यह वाक्य अपने आप में एक सस्पेंस थ्रिलर का क्लाइमेक्स जैसा है, जहां बाहरी दुनिया से संपर्क का हर पुल एक झटके में ढाह दिया जाता है।

अब चौदह सितंबर को आने वाले नतीजों तक ये तमाम किरदार किसी अज्ञात गुप्तवास में रहेंगे। स्क्रिप्ट बिल्कुल साफ़ है—जो चुनाव हारेंगे, उन्हें उनके घर का रास्ता दिखा दिया जाएगा और जो जीतेंगे, उन्हें सीधे सोलह तारीख को मेयर का नामांकन भरने की औपचारिकता तक इसी अभेद्य चक्रव्यूह में क़ैद रखा जाएगा। और अगर कहीं पासा पलटा और नौबत चुनाव की आ गई, तो यह ‘प्रशिक्षण शिविर’नुमा बाड़ेबंदी इक्कीस सितंबर तक लंबी खिंच सकती है।
राजनीति की इस पटकथा में बड़ी मासूमियत से इसे ‘ट्रेनिंग’ का नाम दिया गया है। ज़रा सोचिए, लोकतंत्र के इन चुने हुए नुमाइंदों को लोकतंत्र के ही भय से बचाने के लिए किस खूबी से पिंजरे में डाला जा रहा है! पार्टी के रणनीतिकार जानते हैं कि आज के सियासी बाज़ार में विधायकों या पार्षदों की निष्ठा उतनी पक्की नहीं होती, जितनी कि बसों की खिड़कियों पर चढ़े काले शीशे और दूर-दराज के किसी रिसॉर्ट के ताले।

उदयपुर की झीलों में अभी भी सिहरन बाकी है, लेकिन जिन्हें तैरना था, वे अब राजनीतिक आकाओं की निगरानी में किसी अज्ञात गुप्त ठिकाने की ओर निकल पड़े हैं। जनता ने अपने वोट डाल दिए हैं, मगर उनके चुने हुए नुमाइंदे अब स्वतंत्र नहीं हैं—वे एक अदृश्य रिमोट से चलने वाले उस थियेटर के पात्र हैं, जहाँ परदा चौदह सितंबर के बाद ही उठेगा।
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