मतदान : राष्ट्रप्रेम भी, राष्ट्रधर्म भी : डॉ. प्रदीप कुमावत

उदयपुर। लोकतंत्र में मतदान को लेकर समय-समय पर अनेक अपीलें की जाती हैं। चुनाव आते

 

उदयपुर। लोकतंत्र में मतदान को लेकर समय-समय पर अनेक अपीलें की जाती हैं। चुनाव आते हैं तो समाचार पत्रों, टेलीविजन, सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों से मतदाताओं से अपने मताधिकार का प्रयोग करने का आग्रह किया जाता है। “वोट अवश्य दें”, “आपका एक वोट देश की दिशा तय करता है”, “पहले मतदान, फिर जलपान” जैसे अनेक संदेश सुनाई देते हैं। इन अपीलों का अपना महत्व है, लेकिन मेरे मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है—क्या हमने कभी मतदाता को वास्तव में यह समझाने का प्रयास किया कि उसे मतदान क्यों करना चाहिए?
केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि मतदान हमारा अधिकार है। मतदाता को यह समझना होगा कि लोकतंत्र ने उसे कितना बड़ा अधिकार, कितनी बड़ी शक्ति और कितनी बड़ी जिम्मेदारी प्रदान की है।
एक समय था जब किसी राष्ट्र की सत्ता किसी एक राजा, सम्राट या शासक के हाथों में केंद्रित होती थी। राजा निर्णय लेता था और प्रजा उन निर्णयों को स्वीकार करती थी। राज्य की दिशा, शासन की व्यवस्था और भविष्य का निर्धारण कुछ लोगों के हाथ में होता था। लेकिन लोकतंत्र ने इतिहास की इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया।
आज सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता है।
जिस शक्ति का केंद्र कभी किसी राजा का राजमहल हुआ करता था, वही शक्ति आज एक सामान्य नागरिक की उंगली पर लगी स्याही में दिखाई देती है। एक साधारण नागरिक मतदान केंद्र पर जाकर यह तय कर सकता है कि अगले वर्षों तक उसके क्षेत्र, राज्य या देश का नेतृत्व कौन करेगा। वह चाहे तो किसी व्यक्ति या दल को सत्ता के शिखर तक पहुंचा सकता है और चाहे तो उसी सत्ता से उसे नीचे उतार सकता है।
इससे बड़ा लोकतांत्रिक उपहार मनुष्य को और क्या मिल सकता है?
इसीलिए मतदान केवल एक बटन दबाना नहीं है। यह उस शक्ति का प्रयोग है, जो लोकतंत्र ने प्रत्येक नागरिक को समान रूप से प्रदान की है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति—जनता
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहां किसी व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक स्थिति मतदान केंद्र पर उसकी शक्ति को बड़ा या छोटा नहीं करती। एक बड़े उद्योगपति का वोट और एक सामान्य श्रमिक का वोट समान मूल्य रखता है। एक विद्वान का वोट और एक अशिक्षित व्यक्ति का वोट संवैधानिक दृष्टि से समान है। करोड़ों की संपत्ति रखने वाले व्यक्ति की राजनीतिक शक्ति भी एक वोट है और साधारण जीवन जीने वाले नागरिक की भी राजनीतिक शक्ति एक वोट है।
मतदान केंद्र के भीतर प्रवेश करते ही हम सब एक समान हो जाते हैं।
यही लोकतंत्र का अद्भुत दर्शन है।
इसलिए मतदान करते समय हमें यह अनुभव होना चाहिए कि हम केवल किसी उम्मीदवार को वोट नहीं दे रहे, बल्कि हम अपने प्रतिनिधि, अपने शासन और अपने भविष्य की दिशा चुन रहे हैं।
लोकतंत्र में जनता केवल शासित होने वाली प्रजा नहीं है; जनता ही शासन की निर्णायक शक्ति है।
इसलिए जिस नागरिक को यह शक्ति प्राप्त है, उसका मतदान न करना केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं माना जा सकता। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति हमारी जिम्मेदारी से भी जुड़ा हुआ विषय है।
राष्ट्रप्रेम केवल सीमा पर दिखाई नहीं देता
हमारे मन में राष्ट्रप्रेम की एक सामान्य तस्वीर बनी हुई है। जब हम तिरंगे को देखते हैं, राष्ट्रगान सुनते हैं, सेना के जवानों को देश की सीमाओं पर कठिन परिस्थितियों में डटे देखते हैं या किसी अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में भारतीय खिलाड़ी को तिरंगा लेकर दौड़ते देखते हैं, तो हमारे भीतर राष्ट्रप्रेम की भावना जाग उठती है।
वास्तव में यह राष्ट्रप्रेम है।
कल्पना कीजिए—एक खिलाड़ी पूरे उत्साह के साथ तिरंगा लेकर मैदान में दौड़ रहा है। उसकी आंखों में विजय का सपना है और उसके हाथ में राष्ट्र की पहचान।
दूसरी ओर देश का सैनिक सीमा की दुर्गम चोटियों पर, माइनस डिग्री तापमान में, अपने परिवार से हजारों किलोमीटर दूर खड़ा है। उसके हाथ में भी तिरंगा है। वह अपने प्राणों की चिंता किए बिना राष्ट्र की सुरक्षा के लिए तत्पर है।
कहीं कोई नागरिक आंदोलन करते हुए भी हाथ में तिरंगा लिए दिखाई देता है। उसके हाथ में भी वही तिरंगा है।
तिरंगा हमारी राष्ट्रीय पहचान है।
तिरंगा हमें याद दिलाता है कि हमारी पहचान व्यक्तिगत सीमाओं से कहीं बड़ी है। हम सब एक राष्ट्र के नागरिक हैं।
लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि राष्ट्रप्रेम केवल तिरंगा हाथ में लेने तक सीमित नहीं है।
राष्ट्रप्रेम हमारे दैनिक व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।
यदि हम पानी बचाते हैं, तो यह भी राष्ट्रप्रेम है।
यदि हम प्लास्टिक और पॉलीथिन के अनावश्यक उपयोग से बचते हैं, तो यह भी राष्ट्रप्रेम है।
यदि हम सड़क पर कचरा नहीं फेंकते, तो यह भी राष्ट्रप्रेम है।
यदि हम किसी जरूरतमंद की सहायता करते हैं, तो यह भी राष्ट्रप्रेम है।
यदि हम सड़क पर यातायात के नियमों का पालन करते हैं, तो यह भी देशभक्ति है।
यदि हम सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाते, तो यह भी राष्ट्रप्रेम है।
यदि हम ईमानदारी से अपना काम करते हैं, अपने व्यवसाय में ग्राहकों के साथ धोखा नहीं करते, अपने कर्मचारियों के अधिकारों का सम्मान करते हैं और अपने हिस्से का कर ईमानदारी से देते हैं, तो यह भी राष्ट्र निर्माण है।
राष्ट्रप्रेम केवल भावनाओं का विषय नहीं है। राष्ट्रप्रेम व्यवहार में उतरने वाली भावना है।
और इसी व्यवहार का एक अत्यंत महत्वपूर्ण रूप है—मतदान।
मतदान : राष्ट्रधर्म क्यों?
‘धर्म’ शब्द का अर्थ केवल पूजा-पद्धति या आस्था नहीं है। धर्म का एक व्यापक अर्थ है—कर्तव्य, उत्तरदायित्व और वह आचरण जिसे व्यक्ति अपनी भूमिका के अनुरूप निभाता है।
एक परिवार में माता-पिता का अपना धर्म और कर्तव्य है कि वे बच्चों का पालन-पोषण करें, उन्हें संस्कार दें और उनके भविष्य की चिंता करें।
एक पिता का धर्म है कि वह अपने परिवार के प्रति अपने दायित्वों को निभाए।
एक शिक्षक का धर्म है कि वह अपने विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम का ज्ञान न दे, बल्कि उन्हें अच्छे नागरिक बनने की दिशा भी दिखाए।
एक व्यवसायी का धर्म है कि वह अपने व्यवसाय में ईमानदारी रखे और अपने कर्मचारियों तथा ग्राहकों के हितों का सम्मान करे।
एक सड़क पर चलने वाले नागरिक का धर्म है कि वह यातायात के नियमों का पालन करे।
एक सक्षम व्यक्ति का धर्म है कि वह कमजोर और जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करे।
हमारी भारतीय चिंतन परंपरा में व्यक्ति के जीवन और उसकी भूमिका के अनुरूप कर्तव्य की बड़ी महत्ता रही है। इसी दृष्टि से देखें तो एक नागरिक का भी अपना राष्ट्रधर्म है।
और उस राष्ट्रधर्म का एक महत्वपूर्ण अंग है—मतदान करना।
क्योंकि जब हम मतदान करते हैं, तब हम केवल अपने लिए निर्णय नहीं लेते। हम अपने क्षेत्र, अपने समाज और व्यापक रूप से अपने राष्ट्र के भविष्य को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
वोट देना क्यों जरूरी है?
कई बार लोग कहते हैं—“मेरे एक वोट से क्या फर्क पड़ेगा?”
यही सोच लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
क्योंकि लोकतंत्र में परिवर्तन किसी एक व्यक्ति के वोट से नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों के छोटे-छोटे निर्णयों से होता है।
एक बूंद से समुद्र बनता है। एक-एक ईंट से भवन बनता है। उसी प्रकार एक-एक वोट से लोकतंत्र की दिशा तय होती है।
यदि एक नागरिक यह सोचकर मतदान नहीं करता कि मेरे एक वोट से क्या होगा, और यही विचार लाखों नागरिकों के मन में आ जाए, तो लोकतंत्र की भागीदारी कमजोर हो जाएगी।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि “मेरे एक वोट से क्या होगा?”
सवाल यह है कि “यदि मैं ही वोट नहीं दूंगा, तो लोकतंत्र में मेरी भूमिका क्या रह जाएगी?”
हम सरकार से सड़क मांगते हैं, बिजली मांगते हैं, पानी मांगते हैं, शिक्षा की बेहतर व्यवस्था चाहते हैं, रोजगार चाहते हैं, सुरक्षा चाहते हैं और विकास चाहते हैं। इन सबके लिए हम शासन से अपेक्षा रखते हैं।
लेकिन शासन चुनने की प्रक्रिया में हमारी भागीदारी कितनी है?
वह भागीदारी मतदान के रूप में सामने आती है।
अधिकार के साथ जिम्मेदारी
हम अक्सर अपने अधिकारों की चर्चा करते हैं, लेकिन लोकतंत्र अधिकार और जिम्मेदारी—दोनों का संतुलन है।
मतदान हमारा अधिकार है, लेकिन उसे जिम्मेदारी की भावना से निभाना भी आवश्यक है।
हम यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि हमारा प्रतिनिधि अच्छा हो, शासन पारदर्शी हो, व्यवस्था बेहतर हो और समाज का भविष्य सुरक्षित हो, लेकिन जब हमें प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिले तो हम मतदान केंद्र तक ही न जाएं।
अच्छे लोकतंत्र के लिए अच्छे मतदाता आवश्यक हैं।
मतदान करते समय जाति, धर्म, भाषा, व्यक्तिगत संबंध, क्षणिक भावनाओं या किसी छोटे व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर उम्मीदवार और उसके कार्य, विचार, क्षमता, चरित्र तथा क्षेत्र के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर विचार करना चाहिए।
लोकतंत्र में मतदाता की उंगली पर लगी स्याही कुछ घंटों या दिनों में मिट जाती है, लेकिन उसके द्वारा किया गया चुनाव वर्षों तक उसके क्षेत्र और समाज को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए मतदान से पहले विचार करना भी उतना ही आवश्यक है जितना मतदान करना।
राष्ट्र निर्माण की शुरुआत नागरिक से होती है
हम अक्सर कहते हैं कि देश को बदलना चाहिए।
लेकिन देश कौन बदलता है?
सरकार?
प्रशासन?
राजनेता?
व्यवस्थाएं?
निश्चित रूप से इन सबकी भूमिका है। लेकिन लोकतंत्र में इन सभी संस्थाओं की नींव नागरिक है।
जैसे परिवार समाज की पहली इकाई है, वैसे ही नागरिक लोकतंत्र की पहली इकाई है।
यदि नागरिक जागरूक है तो लोकतंत्र मजबूत होगा। यदि नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग है तो व्यवस्था बेहतर होगी। यदि नागरिक ईमानदार है तो समाज में ईमानदारी बढ़ेगी। यदि नागरिक कानून का सम्मान करता है तो कानून व्यवस्था मजबूत होगी। और यदि नागरिक सोच-समझकर मतदान करता है तो लोकतंत्र की गुणवत्ता बेहतर होगी।
इसलिए राष्ट्र निर्माण किसी एक दिन का कार्यक्रम नहीं है।
राष्ट्र निर्माण रोज होता है।
हम पानी बचाकर राष्ट्र निर्माण करते हैं।
पेड़ लगाकर राष्ट्र निर्माण करते हैं।
करों का ईमानदारी से भुगतान करके राष्ट्र निर्माण करते हैं।
सड़क के नियमों का पालन करके राष्ट्र निर्माण करते हैं।
किसी गरीब बच्चे की शिक्षा में सहायता करके राष्ट्र निर्माण करते हैं।
अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदारी से काम करके राष्ट्र निर्माण करते हैं।
और मतदान करके भी राष्ट्र निर्माण करते हैं।
सैनिक सीमा पर, नागरिक मतदान केंद्र पर
देश की सीमा पर खड़ा सैनिक अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा है। वह अपने हिस्से का राष्ट्रधर्म निभा रहा है।
लेकिन लोकतंत्र में नागरिक का राष्ट्रधर्म क्या है?
उसका एक महत्वपूर्ण उत्तर है—मतदान।
सैनिक सीमा की रक्षा करता है और नागरिक लोकतंत्र की रक्षा करता है।
सैनिक अपने हथियार से राष्ट्र की सुरक्षा करता है और नागरिक अपने मत से लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करता है।
सैनिक को यह अधिकार नहीं कि वह अपने कर्तव्य से पीछे हट जाए और कहे कि मेरे अकेले से क्या फर्क पड़ेगा। उसी प्रकार एक नागरिक को भी यह सोचकर मतदान से दूर नहीं रहना चाहिए कि मेरे अकेले के वोट से क्या परिवर्तन होगा।
जिस प्रकार सीमा पर खड़ा प्रत्येक सैनिक महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार लोकतंत्र के मतदान केंद्र पर पहुंचने वाला प्रत्येक नागरिक महत्वपूर्ण है।
इसलिए मतदान केंद्र की कतार को भी हमें एक प्रकार की राष्ट्रसेवा के रूप में देखना चाहिए।
वहां खड़ा प्रत्येक मतदाता लोकतंत्र का प्रहरी है।
तिरंगे से मतदान केंद्र तक
हम तिरंगे का सम्मान करते हैं। तिरंगा हमारे लिए गौरव है। राष्ट्रगान सुनते समय हम सम्मान से खड़े होते हैं। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर हम राष्ट्र के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं।
लेकिन राष्ट्रप्रेम की भावना को वर्ष में दो-चार अवसरों तक सीमित नहीं किया जा सकता।
राष्ट्रप्रेम तब सार्थक होगा, जब वह हमारे जीवन के सामान्य व्यवहार में दिखाई देगा।
और लोकतंत्र में राष्ट्रप्रेम का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर मतदान दिवस है।
उस दिन मतदान केंद्र तक जाना, अपने मत का विवेकपूर्ण उपयोग करना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेना—यह केवल चुनावी औपचारिकता नहीं है।
यह राष्ट्र के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।
यह अपने वर्तमान के प्रति जिम्मेदारी है।
यह अपने बच्चों के भविष्य के प्रति जिम्मेदारी है।
यह आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी है।
मतदान करें, क्योंकि शक्ति आपके हाथ में है
हमारे लोकतंत्र ने सत्ता को महलों से निकालकर जनता के हाथों में दिया है।
अब कोई राजा अकेले यह तय नहीं करता कि शासन किस दिशा में जाएगा। जनता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन की दिशा तय करती है।
इसलिए मतदान केंद्र पर पहुंचने वाला प्रत्येक नागरिक वास्तव में लोकतंत्र के उस महान दर्शन को जीवित करता है, जिसमें जनता ही सर्वोच्च है।
हमारे हाथ में जो मतपत्र या मतदान मशीन का बटन है, वह केवल कागज या मशीन का हिस्सा नहीं है। वह हमारे लोकतांत्रिक अधिकार का प्रतीक है।
उस एक निर्णय में हमारी आशा भी है, हमारी जिम्मेदारी भी है और हमारे भविष्य की दिशा भी।
इसलिए मतदान के दिन यह न सोचें कि यह केवल छुट्टी का दिन है।
यह वह दिन है जब लोकतंत्र आपको अपनी शक्ति का उपयोग करने के लिए बुलाता है।
यह वह दिन है जब देश का संविधान आपको कहता है—आपकी आवाज महत्वपूर्ण है।
यह वह दिन है जब लोकतंत्र कहता है—आपका निर्णय मायने रखता है।
और यह वह दिन है जब एक नागरिक स्वयं से कह सकता है—
“मैं अपने राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा हूं।”
आइए, मतदान को केवल अधिकार के रूप में न देखें।
इसे राष्ट्रप्रेम के रूप में देखें।
इसे राष्ट्रधर्म के रूप में देखें।
इसे नागरिक कर्तव्य के रूप में देखें।
जिस तरह देश की सीमा पर खड़ा सैनिक अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटता, उसी तरह लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में हमें भी अपने मतदान के कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए।
देशभक्ति केवल तिरंगा उठाने में नहीं, देश के प्रति अपने दायित्व को निभाने में है।
और लोकतंत्र में एक जागरूक नागरिक का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व है—
मतदान अवश्य करें।
क्योंकि सत्ता किसी एक राजा की नहीं रही।
सत्ता अब जनता के हाथ में है।
आओ, अपने उदयपुर की लोकल सरकार खुद बनाए अपने बोर्ड का गठन करें।अपना प्रतिनिधि भेजें।आपका वोट आपको गर्व से कहने के लिए अवसर देगा कि मैंने तुम्हें चुनकर भेजा है और यह बोर्ड मेरा है।यह तभी है जब आप वोट करेंगे
और जनता की इस शक्ति का सबसे सुंदर, शांतिपूर्ण और संवैधानिक स्वरूप है—आपका वोट।
मतदान करें—राष्ट्र के लिए, लोकतंत्र के लिए, आने वाली पीढ़ियों के लिए।
मतदान करें—क्योंकि यह आपका अधिकार ही नहीं, आपका राष्ट्रधर्म भी है।

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