
सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर
हम जब भी भारत में लोकतंत्र की बात करते हैं, हमारी आदत दिल्ली के लुटियंस ज़ोन या राज्यों की राजधानियों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर आंकड़े उछालने की हो चुकी है। हम भूल जाते हैं कि लोकतंत्र की असली नब्ज संसद के सेंट्रल हॉल में नहीं, किसी दूरदराज शहर के वार्ड की धूल भरी, बदहाल और संकरी गलियों में धड़कती है।
उदयपुर नगर निगम का वार्ड नंबर 7 इस समय इसी जमीनी हकीकत का एक बेबाक आईना बना हुआ है। पुराने वार्डों के दो फांकों को जोड़कर बनाया गया यह नया इलाका दरअसल सत्ता और समाज की उस परत को उघाड़ता है जिसे हमारे हुक्मरान अक्सर अनदेखा कर देते हैं। मल्लातलाई, महाकाल रोड, अंबामाता स्कीम से लेकर अंबावगढ़ और तालाब किनारे की कच्ची बस्तियों तक फैला यह वार्ड विविधता का अजीबोगरीब संगम है। यहां सिर्फ 46 वोटों का अंतर है महिला और पुरुष मतदाताओं के बीच। यानी संतुलन इतना नाजुक है कि किसी भी तरफ का पलड़ा जरा-सा झुका नहीं कि सियासत का पूरा गणित उलट जाए।
चुनावी बिसात पर दो युवा आमने-सामने खड़े हैं। दोनों अनुसूचित जाति वर्ग से आते हैं। एक तरफ कांग्रेस के पुराने चेहरे शंकर चंदेल हैं—पूर्व पार्षद, जो अपने पुराने रसूख और किए गए कामों की फेहरिस्त लेकर दरवाजे-दरवाजे दस्तक दे रहे हैं। लेकिन जैसा कि आज की सियासत का मुकम्मल दस्तूर बन चुका है, उनके दामन पर भी ‘तुष्टीकरण’ के राजनीतिक तीर चलाए जा रहे हैं।
दूसरी तरफ भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे गजेंद्र सिंह चौहान (मनीष) हैं। एक बेहद सामान्य, गैर-सियासी परिवार का नौजवान। छात्र राजनीति के पर्दे के पीछे बैठकर चुनावी गोटियां बिठाने वाला यह लड़का आज खुद मोर्चे पर है, अंबेडकर मंडल के महामंत्री के तौर पर।
मगर इस पूरी सियासी उठापटक में जो बात चौंकाती है, वह नारों की पारंपरिक लफ्फाजी नहीं है। इस तथाकथित ‘जेन-जी’ पीढ़ी के नौजवान गजेंद्र चौहान से जब आप बात करते हैं, तो आपको अहसास होता है कि बुनियादी सवालों का दायरा अब बदल रहा है। अमूमन निकाय चुनावों में नेता पानी-बिजली और टूटी सड़कों के घिसे-पिटे जुमले उछालकर वोट बटोरने निकल पड़ते हैं। लेकिन गजेंद्र का नजरिया बताता है कि बीमारी की जड़ें कहां हैं।
उदयपुर झीलों का शहर है, पर्यटन इसकी रीढ़ है। और यह पूरा वार्ड पर्यटन के लिहाज से बेहद संवेदनशील और व्यस्त इलाका है। गजेंद्र सीधे मुद्दे पर आते हैं—‘हमारे वार्ड में कहीं ढंग का साइन बोर्ड तक नहीं है। बाहर से आया पर्यटक भटकता है, तंग गलियों में गाड़ियां फंसा देता है और फिर पूरा इलाका घंटों जाम की विभीषिका झेलता है।’
सोचिए, जिस बात को नगर निगम के आला अफसर और योजनाकार दशकों में नहीं समझ पाए, वह एक साधारण युवा की पहली प्राथमिकता है।
दूसरा सवाल उससे भी ज्यादा कड़वा और मानवीय है—सार्वजनिक शौचालय। खास तौर पर महिलाओं और बाहर से आने वाली महिला पर्यटकों के लिए। किसी शहर का विकास इस बात से नहीं नापा जाता कि उसकी चौड़ी सड़कों पर कितनी चमचमाती गाड़ियां दौड़ रही हैं, पैमाना यह होना चाहिए कि आधी आबादी को सार्वजनिक जगहों पर बुनियादी मानवीय गरिमा मयस्सर है या नहीं। गजेंद्र का यह कहना कि महिलाओं को शौचालय ढूंढने के लिए भटकना न पड़े और इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश हों, हमारी पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
सड़क, नाली और झीलों की सफाई तो खैर नगर निगम की नियमित जिम्मेदारी है, उसमें कोई नया करिश्मा नहीं हो सकता। सवाल यह है कि क्या उदयपुर का मतदाता उस दृष्टि को पहचान पाएगा जो समस्याओं को रस्म अदायगी के बजाय एक नागरिक के दर्द की तरह देख रही है?
फैसला मतदाताओं के हाथ में है। वे पुराने तजुर्बे और सियासी आरोपों के बीच शंकर चंदेल की तरफ जाते हैं या गजेंद्र की इस नई, व्यवहारिक और साफगोई भरी दृष्टि पर दांव लगाते हैं। लेकिन वार्ड 7 की यह लड़ाई एक बात तो साफ कर ही देती है—जब तक हमारी राजनीति साइन बोर्ड, शौचालय और नागरिक गरिमा जैसे बुनियादी सवालों से आंखें चुराती रहेगी, हमारा लोकतंत्र यूं ही संकरी गलियों में रास्ता भटकता रहेगा।
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