
सैयद हबीब, उदयपुर।
सिनेमा के पर्दे पर जब कोई फिल्म छह बार लगातार ‘सुपरहिट’ हो चुकी हो, तो सातवीं कड़ी बनाते वक्त निर्देशक के हाथ थोड़े कांपते जरूर हैं। दर्शक कहानी के हर मोड़ से वाकिफ हो चुका होता है, नायक के संवाद बासी लगने लगते हैं और खलनायक की चालें पहचानी हुई सी लगती हैं। उदयपुर नगर निगम के अस्सी वार्डों का यह चुनावी तमाशा भी बिल्कुल किसी लंबी चलती आ रही फ्रेंचाइजी जैसा है, जहां आज करीब पचहत्तर फीसदी मतदान के बाद जनता रूपी दर्शक अपने घरों को लौट चुकी है और बॉक्स ऑफिस की खिड़की पर सिर्फ अटकलों की पर्चियां बची हैं।
मतदान केंद्रों के बाहर धूप में खड़े मतदाताओं की आंखों में झांकिए, तो वहां किसी भव्य जीत का उल्लास नहीं, बल्कि एक अजीब-सी ऊब और तल्खी साफ पढ़ी जा सकती है। छह बार जिस भारतीय जनता पार्टी को उदयपुर ने सिर-आंखों पर बिठाया, इस बार उसके सातवें बोर्ड की राह बिल्कुल बहुमत की सीमा रेखा पर थमती दिख रही है।
नेपथ्य से छनकर आ रही आवाजें दो अलग-अलग पटकथाएं बयां कर रही हैं। पहला रुझान कहता है कि भाजपा पैंतालीस से पचास सीटों के बीच हांफते हुए जा पहुंचेगी। दूसरा थोड़ा और उदार होकर उसे पचास से पचपन तक खींचता है। यानी बोर्ड तो बन सकता है, मगर वह चमक गायब रहेगी जो कभी एकछत्र राज की हुआ करती थी। वजह साफ है—फिल्म के मुख्य किरदार यानी दिग्गज और संभावित मेयर पद के चेहरे तो अपनी-अपनी सीट किसी तरह बचा ले जाएंगे, लेकिन ‘सपोर्टिंग कास्ट’ यानी आम वार्डों में दर्शकों का मिजाज खासा बिगड़ा हुआ नजर आया। कहीं टिकट बंटवारे की नासमझी पर गुस्सा था, तो कहीं ‘बाहरी’ किरदारों को जबरन पर्दे पर थोपने की नाराजगी। भीतरघात का आलम यह रहा कि भाजपा के पुराने सिपहसालार ही खामोशी से अपनी ही पार्टी की नैया में छेद करते देखे गए।
और हमारी मुख्य विपक्षी कांग्रेस? उसकी हालत उस थके हुए थियेटर ग्रुप जैसी रही जिसे खुद अपनी लिखी स्क्रिप्ट पर यकीन नहीं था। मतदाता हंसकर कहते हैं—’कांग्रेस ने तो मिलकर चुनाव लड़ा ही नहीं!’ जो मैदान में थे, वे अपनी-अपनी निजी पूंजी और दम पर लड़ रहे थे, पार्टी का झंडा तो बस औपचारिकता भर था। मगर जब सत्ता पक्ष से नाराजगी हो, तो उदासीनता भी कभी-कभी अप्रत्याशित सीटें दिला देती है। माना जा रहा है कि कांग्रेस पच्चीस से तीस सीटों का सम्मानजनक आंकड़ा छू सकती है। उसके पास यहां मेयर की कुर्सी की कोई दिली हसरत नहीं थी; उसकी निगाहें तो बस ‘नेता प्रतिपक्ष’ के रोल पर टिकी हैं। चाहे वह स्व. डॉ. गिरिजा व्यास की भतीजा बहू हितांशी शर्मा हों या जिलाध्यक्ष फतहसिंह राठौड़ की पत्नी—मंच के पीछे की सारी कवायद सिर्फ उस एक कुर्सी के इर्द-गिर्द सिमटी रही।
बहरहाल, झीलों के इस शहर ने अपना फैसला मतपेटियों में सील कर दिया है। हवा में बदलाव की हल्की-सी सिहरन जरूर थी, मगर विकल्प के अभाव में जनता ने क्या सचमुच कोई नया ड्रामा रचा है या फिर उसी पुराने नायक को फटे हुए तंबू के नीचे एक और मौका दे दिया है? क्लाइमेक्स अभी बाकी है, और जैसा कि हर सस्पेंस फिल्म में होता है—फैसला उस वक्त तक अधूरा है जब तक कि पर्दे पर ‘द एंड’ न लिख उठे।
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