
उदयपुर। सवा सौ साल पुराना इतिहास, देश-विदेश के दुर्लभ पेड़-पौधों की अनमोल विरासत और कंक्रीट के जंगल बन चुके उदयपुर शहर का सबसे बड़ा ‘ऑक्सीजन पॉकेट’— गुलाबबाग उद्यान। यह वह धरोहर है जिसने बिना किसी बड़े सरकारी तामझाम के, पीढ़ियों से इस शहर को खुलकर सांस लेने की सहूलियत दी है। लेकिन आज यह ऐतिहासिक उद्यान विकास की कम और प्रशासनिक सनक की मार ज्यादा झेल रहा है। नगर निगम के नए ‘अनुशासन’ और पाबंदियों के पुलिंदे ने आम जनता के बीच एक बड़ा विमर्श छेड़ दिया है: क्या व्यवस्था सुधारने का मतलब सिर्फ ताले और पाबंदियां लगाना है?
नगर निगम कमिश्नर अभिषेक खन्ना द्वारा जारी की गई नई गाइडलाइन को लेकर अब यह सवाल तीखा हो चला है कि आखिर निगम संवारने की जिम्मेदारी से भागकर केवल ‘तुगलकी फरमान’ जारी करने में ही अपनी सार्थकता क्यों देख रहा है? पर्यावरण प्रेमी, एडवोकेट व पूर्व पार्षद दिनेश गुप्ता ने निगम के इन नए नियमों के प्रति गहरा आक्रोश व चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह पूरी तरह से तुगलकी फरमान है। पाबंदियों पर गुप्ता के हवाले से पढ़िए पूरी रिपोर्ट…।
पाबंदियों का नया ‘अध्यादेश’ : क्या करें और क्या न करें?
नगर निगम ने उद्यान की सुरक्षा, स्वच्छता और तथाकथित ‘अनुशासित वातावरण’ का हवाला देते हुए पाबंदियों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार की है:
समय का पहरा : अब सुबह 5 बजे से रात 8 बजे तक ही सैर-सपाटा संभव होगा। (दो दशक पहले हुए एक हादसे के बाद रात 8 बजे के बाद प्रवेश वैसे भी बंद है, तो इस नए नियम का औचित्य समझ से परे है)।
नो-प्ले ज़ोन : खेलकूद पर पूरी तरह सर्जिकल स्ट्राइक कर दी गई है। अब बच्चे या युवा यहाँ क्रिकेट, फुटबॉल, वॉलीबॉल, बेसबॉल या बैडमिंटन नहीं खेल सकेंगे। नियम तोड़ा तो सीधे कानूनी कार्रवाई होगी।
झूलों पर पहरा: हाथी पार्क के झूले सिर्फ बच्चों के लिए होंगे। अगर किसी वयस्क ने बचपन याद करने की हिमाकत की, तो खैर नहीं।
बेजुबानों पर संकट: पेड़ों के पास अनाज डालने, कुत्तों और बंदरों को खाना खिलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है।
नो-व्हीकल और जुर्माना: कचरा फैलाने पर तगड़ा जुर्माना होगा और गीला-सूखा कचरा अलग-अलग डालना होगा। दोपहिया और चारपहिया वाहनों के प्रवेश पर पहले जैसी ही रोक रहेगी, केवल विशेष अनुमति वाले वाहन ही रेंग सकेंगे। पौधों से फूल या पेड़ों से फल तोड़ने पर पुलिसिया डंडा चलेगा।
आलोचनात्मक विश्लेषण : कथनी और करनी का यह कैसा ‘उदयपुर मॉडल’?
नगर निगम का यह तर्क कि ये नियम ‘अनुशासन’ के लिए हैं, पहली नजर में जितना सुहावना लगता है, धरातल की हकीकत उसे उतना ही खोखला साबित करती है।
1. संवारने के नाम पर ‘शून्य’, प्रतिबंधों में ‘नंबर वन’
सच तो यह है कि जब से गुलाबबाग नगर निगम के अधीन आया है, इसके मूल स्वरूप को निखारने के लिए कोई दूरदर्शी प्रयास नहीं दिखा। पूर्व विधायक गुलाबचंद कटारिया के समय जो थोड़े-बहुत हिस्से संवारे गए थे, वे अब रख-रखाव के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। उद्यान के पैदल पाथवे (वाकिंग ट्रैक) उखड़े पड़े हैं, जिनमें बरसों से कंक्रीट का एक दाना तक नहीं डाला गया।
2. प्यासी जनता और बदहाल आधुनिकता
उद्यान में आने वाले लाखों पर्यटकों और स्थानीय नागरिकों के लिए पीने के पानी के नल महीनों से बंद पड़े हैं। लाखों रुपये की भारी-भरकम लागत से जो ‘आधुनिक शौचालय’ बनाया गया था, वह आज निगम की घोर लापरवाही के चलते शहर के किसी भी आम बदबूदार सार्वजनिक शौचालय में तब्दील हो चुका है।
3. छलावा बनी सफाई व्यवस्था
सड़कों पर झाड़ू लगाकर निगम भले ही अपनी पीठ थपथपा ले, लेकिन घने पेड़-पौधों के बीच झांकते ही कचरे के बड़े-बड़े ढेरों का साम्राज्य नजर आता है। क्या इन ढेरों को साफ करने के लिए भी जनता पर ही कोई नया नियम थोपा जाएगा?
4. प्रकृति के संतुलन से छेड़छाड़
पूर्व में अमरूद बाड़ी, जामुन और आम के पेड़ों के ठेके यह कहकर बंद कर दिए गए थे कि इन फलों पर केवल पक्षियों का प्राकृतिक अधिकार है। लेकिन अब नए नियमों में इंसानों द्वारा पक्षियों को दाना डालने और आवारा जानवरों को खाना खिलाने पर भी जेल और जुर्माने का डर दिखाया जा रहा है। यह विरोधाभास नहीं तो और क्या है?
तीखा सवाल: जो खुद का दफ्तर न संभाल पाए, वो विरासत क्या संभालेगा?
शहर के जागरूक नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों का गुस्सा इस बात पर है कि रोक लगाना सबसे आसान काम है। अगर यही नीति है, तो गुलाबबाग के भीतर पीडब्ल्यूडी (PWD) का दफ्तर तो पहले से ही है, क्यों न वहां एक पुलिस थाना, एसपी या आईजी का दफ्तर भी खुलवा दिया जाए? सरकारी रसूख के आते ही आम जनता का प्रवेश वैसे ही हमेशा के लिए बंद हो जाएगा!
विडंबना देखिए, जिस निगम दफ्तर में बैठकर कमिश्नर साहब ये फरमान टाइप करवा रहे हैं, उसके ठीक बाहर स्थित ‘नेहरू बाल उद्यान’ तबाही के कगार पर है और निगम उसका संरक्षण करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि जो प्रशासन अपने दफ्तर के ठीक बाहर की हरियाली नहीं संभाल सकता, उसे सवा सौ साल पुरानी वैश्विक विरासत पर ऐसे अव्यावहारिक प्रतिबंध थोपने का क्या नैतिक अधिकार है?
नगर निगम को पाबंदियों की राजनीति करने से पहले कोई एक नया उद्यान बनाकर शहर के सामने उदाहरण पेश करना चाहिए। वरना, विरासत में मिली चीजों पर ताले लगाना व्यवस्था सुधारना नहीं, बल्कि प्रशासनिक लाचारी को छिपाने का सबसे आसान रास्ता है।
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