प्रो. विजय श्रीमाली प्रथम स्मृति व्याख्यान में छलक उठीं यादें— वह वटवृक्ष जिसकी छांव में कई परिवार हुए पल्लवित

उदयपुर।

कुछ लोग पदों को सुशोभित करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जिनके होने से पदों की गरिमा बढ़ जाती है। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के प्रांगण में जब प्रथम प्रो. विजय श्रीमाली स्मृति व्याख्यान का आगाज़ हुआ, तो फिज़ाओं में केवल शब्द नहीं, बल्कि उस ‘कर्मयोगी’ की स्मृतियां तैर रही थीं, जिसने अपनी पूरी उम्र समाज और छात्रों के नाम कर दी।

विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. बी. पी. सारस्वत जब प्रो. श्रीमाली को याद करने खड़े हुए, तो उनकी आवाज़ में एक भारीपन था। उन्होंने कहा, “विजय श्रीमाली केवल एक नाम नहीं, एक अहसास थे। वे कुलपति, डीन और प्रॉक्टर जैसे भारी-भरकम ओहदों पर रहे, लेकिन उनका दिल हमेशा एक साधारण छात्र की फिक्र में धड़कता था।”

प्रो. सारस्वत ने उन अनछुए पन्नों को खोला जिन्हें प्रो. श्रीमाली ने कभी प्रचार का माध्यम नहीं बनाया।

गुमनाम मददगार : किसी गरीब छात्र की फीस रुकी हो या किसी बेसहारा परिवार की बेटी की शादी हो, प्रो. श्रीमाली वहां एक मसीहा बनकर खड़े मिलते थे। वे मदद इस हाथ से करते कि दूसरे हाथ को खबर तक न होती।

बंजर को दी हरियाली : लॉ कॉलेज के पीछे की वह जमीन जो कभी पत्थरों और धूल से अटी पड़ी थी, आज हज़ारों पेड़ों की सांसों से महक रही है। वह जंगल नहीं, प्रो. श्रीमाली की दूरदृष्टि का जीवंत स्मारक है।

कर्म ही थी जिनकी असली वंदना : मुख्य वक्ता पद्मश्री श्यामसुन्दर पालीवाल ने प्रो. श्रीमाली को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि नेतृत्व का असली अर्थ पद की लालसा नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी को ‘कर्तव्य’ समझकर निभाना है। प्रो. श्रीमाली ने विपरीत परिस्थितियों और विरोध के बावजूद अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया, और यही एक सच्चे कर्मयोगी की पहचान है।

विशिष्ट अतिथि रविंद्र श्रीमाली ने उन्हें प्रकृति और समाज का सच्चा सेवक बताया। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि प्रो. श्रीमाली ने कभी ख़ुद के लिए नहीं जिया, उनका जीवन ही समाज के लिए एक आहुति था।

आंखों में नमी और संकल्प की लौ : समारोह में जब प्रो. श्रीमाली के पुत्र जतिन श्रीमाली सहित अन्य परिजन और शहर के प्रबुद्ध जन मौजूद थे, तो माहौल पूरी तरह से भावनात्मक हो गया। यह व्याख्यान केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि उन मूल्यों की निरंतरता का प्रतीक बन गया, जिन्हें प्रो. श्रीमाली अपनी विरासत में छोड़ गए हैं।

वाणिज्य महाविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो. शूरवीर सिंह भाणावत ने स्वागत किया और डॉ. देवेंद्र श्रीमाली ने आभार जताया। कार्यक्रम के अंत तक हर आंख नम थी, लेकिन दिलों में एक संकल्प था—प्रो. श्रीमाली के सेवा भाव को जीवित रखने का।

“प्रो. विजय श्रीमाली आज हमारे बीच देह रूप में नहीं हैं, लेकिन विश्वविद्यालय की हरियाली, ज़रूरतमंदों की दुआओं और छात्रों की सफलता में वे कल भी जीवित थे, आज भी हैं और हमेशा रहेंगे।”

यहां देखें समारोह की तस्वीरें

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