उदयपुर में रामलीला : अवध की बधाइयां, वृंदावन का रूपहला रंग और निम्बार्क मैदान में उतरा कौशल्या-नंदन

फोटो जर्नलिस्ट : कमल कुमावत

आप पढ़ रहे हैं हबीब की रिपोर्ट

सिनेमा के सुनहरे दौर में जब निर्देशक वी. शांताराम या महबूब खान कैमरे के पीछे खड़े होते थे, तो वे किसी दृश्य को सिर्फ कैमरे में कैद नहीं करते थे, वे उसमें आस्था, उल्लास और मिट्टी की सोंधी खुशबू भर देते थे। जब परदे पर खुशियों का कोई त्योहार आता, तो लगता था कि थिएटर की हर कुर्सी पर बैठा इंसान उस जश्न में शरीक हो गया है। शनिवार की शाम उदयपुर के निम्बार्क महाविद्यालय मैदान में जो मंजर उभरा, वह किसी भव्य क्लासिक फिल्म के उस उत्सव-गीत जैसा था, जहां मर्यादा और वात्सल्य का संगम देखकर आंखें नम हो जाती हैं और दिल झूम उठता है।

अवसर था दस दिवसीय श्रीरामलीला के दूसरे दिन का, जब मंच पर वह अमर चौपाई गूंजी—”भये प्रगट कृपाला दीनदयाला, कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी॥”

जैसे ही अवधपुरी में रघुराई के जन्म का शंखनाद हुआ, निम्बार्क मैदान की फिजाओं में ‘जन्म लियो रघुराई, अवध में बाजे बधाई’ की तान छेड़ दी गई। ढोलक की गमक और झांझ की झंकार के बीच पूरा पंडाल झूम उठा। महिलाएं मंगल गीत गाने लगीं, बुजुर्गों की आंखें छलक आईं और युवाओं ने झूम-झूमकर मिठाइयां लुटाना शुरू कर दिया। ऐसा लगा जैसे परदे और हकीकत के बीच की दीवार ढह गई हो; दर्शक केवल दर्शक नहीं रहे, वे राजा दशरथ के उस महल की प्रजा बन गए थे जो अपने उद्धारक के आने का जश्न मना रही थी।

मगर इस उत्सव के उजाले से पहले, वृंदावन के ‘पुष्टिमार्गीय श्री कृष्ण लीला संस्थान’ के मंजे हुए फनकारों ने अंधकार और पीड़ा के उन दृश्यों को भी उतनी ही शिद्दत से साकार किया, जिसके बिना रोशनी का मोल समझ नहीं आता। वेदप्रकाश भारद्वाज और घनश्याम शर्मा के निर्देशन में कलाकारों ने जब रावण की प्रचंड, हठीली तपस्या और फिर पाप के बोझ से कराहती गौ-रूपी पृथ्वी की मार्मिक पुकार को मंचित किया, तो माहौल में एक सन्नाटा खिंच गया। पृथ्वी की उस बेबसी के बाद जब बाल-मुकुंद स्वरूप भगवान का प्राकट्य हुआ, तो वह दृश्य सिनेमाई भाषा में ‘कैथार्सिस’ यानी आत्मा को तृप्त करने वाले सुकून में बदल गया।

समिति के अध्यक्ष धर्मनारायण जोशी ने जब शहर विधायक ताराचंद जैन, पूर्व उपमहापौर लोकेश द्विवेदी, उद्योगपति एस. के. खेतान, संघ के विभाग संघचालक हेमेंद्र श्रीमाली, समाजसेवी सरदार देवेंद्र पाल सिंह रोजी, शांतिलाल जैन, मांगीलाल प्रजापत, हरमंगल सिंह सलूजा, हितेश भाई राजगौर, सेन समाज के संरक्षक राजेंद्र सेन और ओबीसी महापंचायत के संरक्षक दिनेश माली को मंच पर आदरपूर्वक नवाजा, तो लगा कि राम का दरबार आज भी उसी सर्वसमावेशी डोर से बंधा है। भगवान लक्ष्मीनारायण की दिव्य आरती के साथ शुरू हुए इस अनुष्ठान में समिति के हरीश मारवाड़ा, चेतन माली, योवंतराज माहेश्वरी, राकेश खत्री, मुकेश पंवार, चैनशंकर दशोरा, रमेश पुरोहित, सीताराम पालीवाल, हरिशंकर तिवारी, कृष्णकांत जोशी और निर्मल चौबीसा की व्यवस्थागत साधना साफ नजर आ रही थी।

इस आयोजन की सबसे मानवीय और खूबसूरत बात वही है जिसे समन्वयक अशोक बाबेल ने बड़ी सादगी से रेखांकित किया—’न कोई टिकट, न कोई वीआईपी पास; प्रभु की चौखट सबके लिए खुली है। बुजुर्गों के लिए कुर्सियां और सोफे हैं, और हर दिल के लिए खुला निमंत्रण।’ किसी जमाने में राजकपूर की फिल्मों में जो आम आदमी की सहज भागीदारी हुआ करती थी, ठीक वही अपनत्व यहां महसूस होता है।

संयोजक डॉ. विजयप्रकाश विप्लवी ने बताया कि रविवार की शाम कथा का अगला पड़ाव और गहरा होने जा रहा है। महर्षि विश्वामित्र का अवध आगमन होगा, ताड़का और सुबाहु के आतंक का अंत होगा और सबसे भावुक प्रसंग—शिला बन चुकी अहिल्या का प्रभु के चरण-स्पर्श से उद्धार होगा। यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि इस शाश्वत सत्य का मंचन है कि अगर विश्वास सच्चा हो, तो पत्थर भी जीवन पा लेता है।

अवध में बधाई बज चुकी है, लड्‍डू बंट चुके हैं और उदयपुर का यह मैदान उस दिव्य प्रकाश से नहा उठा है जो सदियों से भटकती इंसानियत को सही राह दिखाता आया है।

 

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