
जयपुर | राजस्थान सरकार ने चित्तौड़गढ़ स्थित मेवाड़ यूनिवर्सिटी के खिलाफ परिसमापन (Dissolution) की प्रक्रिया शुरू कर दी है। विश्वविद्यालय अधिनियम 2009 की धाराओं के तहत सरकार ने यूनिवर्सिटी प्रबंधन को नोटिस थमाकर 45 दिनों में जवाब मांगा है कि गंभीर अनियमितताओं के चलते यूनिवर्सिटी को बंद क्यों न कर दिया जाए।
संभागीय आयुक्त उदयपुर के नेतृत्व में गठित जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में यूनिवर्सिटी के भीतर चल रहे ‘डिग्री खेल’ और नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले 13 प्रमुख बिंदुओं का खुलासा किया है:
फर्जी डिग्रियों का अंबार: जांच में पाया गया कि अधिकारियों ने मिलीभगत कर बड़े पैमाने पर फर्जी उपाधियां बांटीं। इस मामले में एसओजी (SOG) पहले ही कई अधिकारियों को गिरफ्तार कर चुकी है, जो फिलहाल न्यायिक अभिरक्षा में हैं।
नियम विरुद्ध PhD : यूजीसी (UGC) के मानकों को ताक पर रखकर 425 पीएचडी (PhD) डिग्रियां बांट दी गईं। शोध की समय अवधि बढ़ाए बिना ही प्रो-प्रेसीडेन्ट और शोध डायरेक्टर द्वारा डिग्रियां जारी की जा रही थीं।
DAESI कोर्स में बड़ा घोटाला : कृषि विस्तार प्रबंधन (MANAGE) के नियमों का उल्लंघन कर क्षमता से अधिक प्रवेश दिए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि परीक्षा होने के बाद भी छात्रों को प्रवेश देकर डिग्रियां थमा दी गईं।
अपात्र स्टाफ और बुनियादी कमियों का बोलबाला: बी.एस.सी (कृषि) जैसे महत्वपूर्ण कोर्स बिना ICAR की मान्यता और बिना योग्य शैक्षणिक स्टाफ के चलाए जा रहे थे। खेती के लिए जरूरी सिंचित भूमि और फार्म जैसे मानक भी कागजों तक सीमित मिले।
प्रशासनिक विफलता और मनमानी
जांच रिपोर्ट के अनुसार, यूनिवर्सिटी के कुलसचिवों और प्रशासनिक अधिकारियों ने नियुक्तियों में यूजीसी के मानदंडों का उल्लंघन किया। गोपनीय दस्तावेजों और परीक्षा रिकॉर्ड का कोई उचित संधारण नहीं किया गया। अधिकारियों को नियम विरुद्ध एक साथ कई उच्च पदों का अतिरिक्त कार्यभार सौंपकर भ्रष्टाचार का रास्ता साफ किया गया।
45 दिन का अल्टीमेटम
उच्च शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि यदि यूनिवर्सिटी प्रबंधन 45 दिनों के भीतर इन 13 बिंदुओं पर संतोषजनक जवाब नहीं देता है, तो मेवाड़ विश्वविद्यालय अधिनियम-2009 की धारा 44(1) के तहत विश्वविद्यालय के परिसमापन (बंद करने) के आदेश जारी कर दिए जाएंगे।
सरकार का रुख : “छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ और शिक्षा के नाम पर फर्जीवाड़ा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मेवाड़ यूनिवर्सिटी में व्याप्त कुप्रशासन और अनियमितताएं प्रथम दृष्टया सिद्ध हो चुकी हैं, अब अंतिम निर्णय नोटिस के जवाब के बाद लिया जाएगा।”
मुख्य आरोपी : जांच में डॉ. सैयद असगर मेंहदी, प्रियंका गौतम, अशोक खरोदिया सहित कई अन्य अधिकारियों की फर्जी डिग्री बांटने में सीधी भूमिका पाई गई है।
असर : सरकार के इस कड़े कदम से प्रदेश की अन्य निजी यूनिवर्सिटीज में भी हड़कंप मच गया है। यह नोटिस स्पष्ट संकेत है कि ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अब उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी लागू हो चुकी है।
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