
उदयपुर। झीलों की नगरी और कागजों में ‘स्मार्ट सिटी’ का तमगा हासिल कर चुके उदयपुर की जमीनी हकीकत अब आम जनता के सब्र का बांध तोड़ रही है। सोशल मीडिया पर शहर की दुर्दशा को लेकर उठी एक गूंज ने प्रशासनिक दावों और नागरिक जिम्मेदारी, दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
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दस्तावेजों में स्वर्ग, हकीकत में नर्क हाल ही में शहर के जागरूक नागरिक चारु कुमार माथुर ने व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि सरकारी दस्तावेजों में तो हम ‘स्मार्ट सिटी’ उदयपुर के निवासी हैं, लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है। भारी भरकम टैक्स चुकाने के बावजूद शहरवासी कचरे के ढेरों और बढ़ते प्रदूषण के बीच सांस लेने को मजबूर हैं। यह विरोधाभास नगर निगम और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
सिस्टम के साथ जनता भी कटघरे में इस चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि दोष केवल प्रशासन पर ही नहीं मढ़ा गया है। चारु माथुर ने स्पष्ट किया कि शहर को गंदा करने में सिर्फ सिस्टम की विफलता ही नहीं, बल्कि आम लोगों की लापरवाही भी उतनी ही जिम्मेदार है। सड़कों पर कचरा फेंकना और नागरिक अनुशासन का अभाव ‘लेक सिटी’ की सुंदरता को ग्रहण लगा रहा है।
बदलते उदयपुर की दो तस्वीरें एक ओर जहां डॉ. अल्पना बोहरा जैसे जागरूक नागरिक एससी छात्रावास की छात्राओं के लिए स्वास्थ्य और स्वच्छता के निःशुल्क शिविर लगाकर व्यक्तिगत सुधार की अलख जगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शहर का बुनियादी ढांचा दम तोड़ता नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक ‘स्मार्ट’ इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ ‘स्मार्ट’ नागरिक बोध का मेल नहीं होगा, तब तक उदयपुर का वास्तविक विकास संभव नहीं है।
जनता की मांग: जवाबदेही तय हो स्थानीय निवासियों का कहना है कि स्मार्ट सिटी के नाम पर खर्च किए गए करोड़ों रुपयों का असर जमीन पर दिखना चाहिए। केवल विज्ञापनों और फाइलों में शहर को सुंदर दिखाने के बजाय प्रदूषण नियंत्रण और कचरा निस्तारण के ठोस प्रयास समय की मांग हैं।
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