
उदयपुर। उदयपुर की राजनीति में शुक्रवार को डबोक एयरपोर्ट पर जो नज़ारा दिखा, वह महज़ एक शिष्टाचार भेंट नहीं थी। पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया के स्वागत में उमड़ी समर्थकों की वह ‘अचानक’ भीड़, मेवाड़ की राजनीति में आने वाले किसी बड़े तूफान की आहट है। यह एक ऐसी पॉलिटिकल थ्रिलर है, जिसमें आरोप हैं, गुटबाजी है और सत्ता की ज़मीन हथियाने की बेताबी भी।
उदयपुर फाइल्स : वह चिंगारी जिसने आग लगाई
इस पूरी कहानी का केंद्र बिंदु वह कथित ‘वीडियोकांड’ है, जिसने भाजपा के भीतर की दरार को एक गहरी खाई में बदल दिया है। एक महिला नेत्री द्वारा दर्ज मुकदमे ने न केवल संगठन की छवि पर सवाल उठाए, बल्कि पार्टी को दो स्पष्ट धड़ों में बाँट दिया:
धड़ा एक : वे मौजूदा पदाधिकारी जो आरोपों के घेरे में हैं और खुद को राजनीतिक साज़िश का शिकार बता रहे हैं।
धड़ा दूसरा : वे जो शुचिता की दुहाई देकर मौजूदा नेतृत्व को बदलने की ताक में हैं।
जब आरोपी पक्ष ने सीधे तौर पर कटारिया का नाम घसीटते हुए इसे ‘प्रायोजित साज़िश’ करार दिया, तो मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन गया।
स्वागत का मनोविज्ञान : डिफेंस या ऑफेंस?
एयरपोर्ट पर हुआ भव्य स्वागत दरअसल एक ‘मूक शक्ति प्रदर्शन’ था। जब किसी कद्दावर नेता पर साज़िश के आरोप लगते हैं, तो उनके समर्थकों का भारी संख्या में जुटना समाज और आलाकमान को यह संदेश देता है कि “नेता अभी भी जनमानस के नायक हैं।”
विश्लेषण : समर्थकों की आंखों में वह जोश और हाथों में पुष्पहार केवल स्वागत के लिए नहीं थे, बल्कि उन आरोपों के खिलाफ एक ढाल थे जो उनके नेता की दशकों की साख पर उठाए गए हैं। यह प्रदर्शन एक जवाब था कि ‘मेवाड़ का शेर’ आज भी समर्थकों के दिल और राजनीति की नब्ज़ पर पकड़ रखता है।
‘चेयर’ की चाहत और दांव पर साख
इस कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ जिलाध्यक्ष पद की दावेदारी है। बीजेपी के 8-10 संभावित दावेदार महज स्वागत करने नहीं पहुंचे थे, बल्कि वे अपनी उपस्थिति दर्ज (Marking Presence) कराने पहुंचे थे।
वर्तमान पदाधिकारियों की कमज़ोर होती स्थिति ने नए चेहरों के लिए रास्ता खोल दिया है।
कटारिया कैंप के ये दावेदार जानते हैं कि भले ही वे राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका में हों, लेकिन उदयपुर भाजपा की चाबी आज भी उन्हीं के ‘आशीर्वाद’ से घूमती है।
क्या यह अंत है या शुरुआत?
यह विडंबना ही है कि जिस पार्टी को ‘अनुशासित’ माना जाता था, वह आज ‘क्लीन चिट’ और ‘साज़िश’ जैसे शब्दों के इर्द-गिर्द सिमट गई है।
आरोप : यदि यह साज़िश है, तो संगठन के भीतर इतनी असुरक्षा क्यों है?
सच्चाई : यदि आरोप सही हैं, तो स्वागत की यह भीड़ नैतिकता पर भारी पड़ती दिख रही है।
स्वागत करने वाले चेहरों की मुस्कुराहट के पीछे दिल्ली और जयपुर तक दौड़ लगा रहे गुटों की बेचैनी साफ झलक रही है। यह स्वागत केवल कटारिया का नहीं था, बल्कि अपनी-अपनी ‘राजनीतिक गोटी’ सेट करने का एक प्रयास था।
उदयपुर की यह ‘पॉलिटिकल स्टोरी’ अभी क्लाइमेक्स से दूर है। ऊंट किस करवट बैठेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ‘उदयपुर फाइल्स’ के पन्ने जांच में क्या उगलते हैं। लेकिन एक बात साफ़ है—एयरपोर्ट के उस स्वागत ने यह बता दिया है कि गुलाबचंद कटारिया को हाशिए पर धकेलने की कोशिश करने वालों के लिए राह इतनी आसान नहीं होने वाली।
सियासत के इस खेल में अब शह और मात की बारी आलाकमान की है।
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