
उदयपुर। कहते हैं कि बच्चों के हाथों में खिलौने और किताबें अच्छी लगती हैं, लेकिन जब उन्हीं मासूम हाथों को चंद रुपयों की खातिर कड़कती और बेरहम कपड़ा फैक्ट्रियों में झोंक दिया जाए, तो समाज और व्यवस्था का सिर शर्म से झुक जाता है। ऐसा ही एक झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां उदयपुर पुलिस की सतर्कता से गुजरात के सूरत शहर की एक कपड़ा फैक्ट्री की चहारदीवारी से 91 नन्हें बाल मजदूरों को नरकीय जीवन से मुक्त कराया गया है।
जनजातीय इलाकों के बचपन पर तस्करों की नजर, 7 से 14 साल की उम्र में मजदूरी का दंश
यह खबर सिर्फ एक पुलिसिया कार्रवाई की सफलता नहीं है, बल्कि हमारे सामाजिक ताने-बाने पर एक गहरा जख्म है। मुक्त कराए गए इन बेकसूर बच्चों की उम्र महज 7 से 14 वर्ष के बीच है— यह वो उम्र है जब बच्चों को सही-गलत की समझ भी नहीं होती। सबसे ज्यादा विचलित करने वाली बात यह है कि मुक्त कराए गए बच्चों में से ज्यादातर बच्चे उदयपुर अंचल के अत्यंत पिछड़े जनजातीय (ट्राइबल) इलाकों से ताल्लुक रखते हैं। अभावों, गरीबी और लाचारी का फायदा उठाकर मानव तस्कर (ट्रैफिकर) इन मासूमों को बहला-फुसलाकर ले गए और इन्हें सूरत के कपड़ा उद्योग में मामूली पैसों पर हाड़-तोड़ मेहनत करने के लिए मजबूर कर दिया।
पुलिस के आने की भनक लगते ही मालिक और ट्रैफिकर फरार, व्यवस्था पर खड़े होते सवाल
जिला पुलिस अधीक्षक डॉ. अमृता दुहन के निर्देशन में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (महिला अनुसंधान प्रकोष्ठ) श्रीमती माधुरी वर्मा और पुलिस उप अधीक्षक छगन पुरोहित के नेतृत्व में मानव तस्करी विरोधी यूनिट ने इस दर्दनाक नेटवर्क को ध्वस्त किया। डॉ. शैलेंद्र पंड्या (बाल अधिकार विशेषज्ञ एवं पूर्व सदस्य, राजस्थान राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग), नितिन पालीवाल, पायल कनेरिया और गायत्री सेवा संस्थान के सहयोग से इस संयुक्त रेस्क्यू ऑपरेशन को अंजाम दिया गया, जिसमें गुजरात पुलिस का भी सहयोग रहा।
लेकिन आलोचनात्मक पहलू यह है कि पुलिस की भनक लगते ही सभी शातिर ट्रैफिकर और फैक्ट्री मालिक मौके से फरार होने में कामयाब हो गए। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि तस्करों का नेटवर्क कितना मजबूत है। आखिर किसकी शह पर इन मासूमों को दूसरे राज्य की सीमाओं के पार ले जाकर फैक्ट्रियों में कैद कर दिया गया? स्थानीय स्तर पर निगरानी तंत्र इतना कमजोर क्यों है कि बच्चों के गायब होने या तस्करी होने की भनक समय पर नहीं लगती?
कानून की किताबें भारी, पर जमीनी हकीकत आज भी लाचार
एसपी डॉ. अमृता दुहन ने सख्त लहजे में कहा कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से मजदूरी कराना एक गंभीर और दंडनीय कानूनी अपराध है। होटल, ढाबे, कारखाने या घरों में बच्चों से काम कराने वालों पर बाल श्रम निषेध अधिनियम के तहत बेहद सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही आमजन से भी अपील की गई है कि वे ऐसी किसी भी सूचना को हेल्पलाइन नंबर 1098, 100 या 112 पर साझा करें।
फिलहाल इन सभी बच्चों को बाल कल्याण समिति, सूरत के समक्ष पेश किया गया है और उन्हें वापस उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाने व कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी अनुत्तरित है— क्या इन बच्चों को मुक्त कराने मात्र से इनका बचपन वापस मिल जाएगा? जब तक ग्रामीण और जनजातीय इलाकों में गरीबी उन्मूलन और शिक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं होंगे, तब तक कानून की बंदूकों के बीच भी कोई न कोई मासूम बचपन इसी तरह चंद रुपयों की खातिर फैक्ट्रियों की काल कोठरी में सिसकने को मजबूर होता रहेगा।
About Author
You may also like
बड़े अस्पताल में इमरजेंसी के बेजान दरवाजे और इंसानियत की धड़कन : परदे के पीछे का दर्द
झीलों के शहर में प्यास की नौटंकी और सड़े हुए पाइप
जयपुर में राडो की ढाई करोड़ की सनसनीखेज डकैती!
उदयपुर रिश्वतकांड में एएसपी की जासूसी और आईफोन के राज
सस्टेनेबिलिटी का वैश्विक मानक : हिन्दुस्तान जिंक का यशद भवन कॉर्पोरेट एक्सीलेंस और LEED प्लेटिनम रेटिंग से पुनः अलंकृत
