कागद कारे : उदयपुर की चुनावी चौपड़ पर तीस साल का तिलिस्म और सड़क का सच

उदयपुर। पर्चे भर दिए गए हैं और कलेक्ट्री से लेकर देहलीगेट तक पसरा हुजूम अब

फोटो : राजेंद्र हिलोरिया

उदयपुर। पर्चे भर दिए गए हैं और कलेक्ट्री से लेकर देहलीगेट तक पसरा हुजूम अब धीरे-धीरे अपने-अपने ठिकानों पर लौट रहा है। लेकिन सियासत का असली खेल तो इसी खाली होते मजमे के पीछे शुरू होता है। जब दफ्तरों के दरवाजे बंद होते हैं और बागी चेहरों को साधने की मनुहारें शुरू होती हैं। देहलीगेट के चौराहे पर जो शोर आज गूंजा, उसमें न तो कांग्रेस का रंग अलग था, न भाजपा का तेवर जुदा। दोनों ही खेमों में वही नारों की खनक थी, वही दावों की गरमाहट और भीड़ का वही बेतरतीब रेला, जिससे किसी हवा का रुख भांप लेना किसी नौसिखिए ज्योतिषी के बस का भी नहीं रहा।

झीलों के इस शहर की मिजाज-पुर्सी करें तो तीस बरस की एक लंबी रिवायत सामने आकर खड़ी हो जाती है। तीन दशकों से इस शहरी हुकूमत पर भाजपा की धोती का खूंटा गड़ा हुआ है। आम बोलचाल में भी लोग यही मानकर बैठ गए हैं कि सीटें चार इधर हो जाएं या छह उधर, तख्त तो उसी के हिस्से जाना है। लेकिन इस बार की चुनावी चौपड़ पर बिछी गोटियां इतनी सीधी नहीं हैं जितनी जुबानों पर तैर रही हैं।

नामांकन के जुलूसों में जो लोग शामिल थे, उनके अपने-अपने गणित थे और अपनी-अपनी बेबसी। दोनों ही पार्टियों के पास ऐसे अंध-भक्तों की कमी नहीं थी जो बिना किसी जमीन को नापे सीधे बोर्ड बनाने का दावा उछाल रहे थे। मगर असली पते की बात उन चेहरों की सुगबुगाहट में थी, जो टिकटों के बंटवारे से भीतर तक जले बैठे हैं। कांग्रेस के अपने ही कई पुराने सिपहसालार कान में फुसफुसाते मिले कि दस-बारह सीटों से ज्यादा की उम्मीद बांधना बेमानी है। हालांकि पार्टी के फैसलों पर सिर झुकाने वालों की दलील थी कि मैदान में उतरे नए चेहरे इस बार बाजी पलट देंगे।

यही हाल दूसरी तरफ भी दिखा। भाजपा के भीतर जो असंतुष्ट हैं, उनका दावा था कि हर गली-कूचे और वार्ड में दबा हुआ गुस्सा इस बार संगठन को भारी पड़ेगा। वहीं संगठन के पैरोकार 55 से 65 सीटों की झोली भरकर सातवीं बार ताजपोशी तय मान रहे हैं। शहर के पुराने सियासी पंडित भी फिलहाल इसी आंकड़े के इर्द-गिर्द अपनी गोटी बिठा रहे हैं।

लेकिन इसी भीड़ के बीच एक तीसरा तबका भी खड़ा था, जो चुपचाप इस पूरे तमाशे को देख रहा था। उसका सवाल सीधा और बेलाग था—तीस साल का राज रहा, पर शहर की झोली में ऐसा कौन-सा काम डाला जिसे शान से गिनाया जा सके? जब यह सवाल पूछा जाता है तो मजबूत से मजबूत पहरेदारों के पसीने छूटते हैं। इस बार पहली दफा वोट डालने जा रही उस नई पीढ़ी (जेन-जी) का मिजाज भी अभी किसी के पकड़ में नहीं आया है, जो न तो पुरानी निष्ठाओं से बंधी है और न ही नारों से बहलने वाली है।

दावे अपनी जगह हैं, बगावत अपनी जगह और नाराजगी अपनी जगह। लोकतंत्र की यह चौपाल अब सज चुकी है। देखना यही है कि तीस साल की इस जमी-जमाई रिवायत पर जनता बदलाव की मुहर लगाती है या सियासत फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौट जाती है। फैसला मतपेटी के भीतर कैद होना है, और ऊंट किस करवट बैठेगा—यह शहर की खामोश समझ पर छोड़ देना ही मुनासिब होगा।

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