एक तस्वीर, कई तकदीरें : उदयपुर नगर निगम चुनाव का सियासी शास्त्र

उदयपुर। कहते हैं कि सियासत में तस्वीरें सिर्फ चेहरे नहीं दिखातीं, बल्कि बंद कमरों में तय हुए नफे-नुकसान का पूरा कच्चा-चिट्ठा खोलकर रख देती हैं। उदयपुर नगर निगम चुनाव के नामांकन के इस गहमागहमी भरे माहौल से निकली यह तस्वीर भी अपने आप में चुनावी राजनीति का पूरा दृश्य-काव्य समेटे हुए है।

तस्वीर के केंद्र में शहर विधायक ताराचंद जैन मौजूद हैं। कल तक जो कभी खुद पार्षद का पर्चा भरकर निगम की सीढ़ियां चढ़े थे और बतौर जिलाध्यक्ष चुनाव लड़ाने का हुनर दिखाते रहे, आज वही विधायक की ऊंची आसंदी से पूरी टीम का नेतृत्व संभाल रहे हैं। लेकिन असली बात विधायक जी के इर्द-गिर्द खड़े उन साथियों की है, जिनकी भूमिकाएं इस चुनावी तराजू पर अलग-अलग रूप में सामने आई हैं।

विधायक जी के जो ‘दाएं’ माने जाते हैं, वे पूरी निष्ठा से दाएं खड़े हैं; और जो ‘बाएं’ रहे हैं, वे संतुलन साधते हुए बाएं टिके हैं। फ्रेम में दिख रहा हर चेहरा संगठन के प्रति एक अलग समर्पण की दास्तान बयां कर रहा है।

एक तरफ वे त्यागी साथी हैं, जिन्होंने संगठन हित में ऐन वक्त पर मैदान से कदम पीछे खींच लिए—ताकि नए चेहरों को आगे आने का मौका मिल सके।

दूसरी तरफ वे निष्ठावान साथी खड़े हैं, जिनके हक की लड़ाई विधायक जी शायद उस मजबूती से नहीं लड़ सके जिसकी दरकार थी। टिकट हाथ से फिसल गया, पैरवी कमजोर पड़ गई, मगर वफादारी का तकाजा देखिए कि जब टिकट नहीं मिला, तो उन्होंने किसी मलाल या शिकवे के बजाय गजब का राजनीतिक साहस और अनुशासन दिखाया। न कोई बगावत, न कोई विरोध के स्वर, संगठन के फैसले को सिर-माथे रखकर वे पूरी गर्मजोशी के साथ पहली पंक्ति में खड़े हैं और चेहरे पर वही सहज मुस्कान लिए जीत का संकल्प दोहरा रहे हैं।

और फिर फ्रेम में चमक रहे हैं वे भाग्यशाली चेहरे, जिन्हें पार्टी का सिंबल भी मिला और जो पूर्व में डिप्टी मेयर का जलवा देखने के बाद एक बार फिर समर में कूद चुके हैं। साफे और दुपट्टों के बीच खिली यह हंसी बता रही है कि टिकट कटने और मिलने के इस खेल में कौन कितना साधक रहा।

ऊपर खुला आसमान है, पीछे नगर निगम की इमारत और सामने जनता। इस एक तस्वीर में स्वेच्छा से किया गया त्याग भी है, बिना किसी शिकायत के संगठन के साथ खड़े रहने का पक्का हौसला भी, और जीत का अटूट विश्वास भी। विधायक जी की अगुवाई में खिंची यह तस्वीर गवाही दे रही है कि टिकट भले ही संगठन स्तर पर तय होते हों, मगर उदयपुर की जमीन पर सियासी ‘दाएं-बाएं’ का यह संतुलन अनुशासन और एकजुटता के दम पर ही कायम रहता है।

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