उदयपुर नगर निगम चुनाव : कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं, पाने को पूरा आसमान है

 

सैयद हबीब, उदयपुर

जिंदगी और सियासत का फलसफा अक्सर सिनेमाई पटकथाओं जैसा ही होता है। जब सब कुछ खामोश दिखे, तो समझ लीजिए कि नेपथ्य में कोई बड़ा दृश्य आकार ले रहा है। झीलों के शहर उदयपुर के मिजाज में इन दिनों वही खामोश बेचैनी तैर रही है, जो किसी सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म के क्लाइमेक्स से ठीक पहले पर्दे पर महसूस होती है। नगर निगम की शहरी हुकूमत का दंगल सज चुका है, मगर इस बार न ढोल-नगाड़े हैं, न ही सूचियों के औपचारिक ऐलान का वो पुराना तमाशा। दोनों ही खेमों ने ‘फोन घुमाओ और पर्चा भरो’ वाली गुप्त रणनीति अपना रखी है।

मगर नजरें ठहरती हैं कांग्रेस के खेमे पर।

तीस बरस… यानी तीन दशक का एक लंबा सियासी वनवास। किसी भी राजनीतिक दल के लिए तीस साल तक सत्ता के गलियारों से बाहर रहना पिछोला की उस ठंडी रात जैसा है, जहां किनारे पर खड़ा मुसाफिर सिर्फ लहरों की छप-छप सुनकर सब्र का घूंट पीता रहता है। 1990 के दशक से नगर निगम की चाबी भाजपा के बक्से में बंद है। भाजपाई खेमे में जीत का अति-उत्साह और सत्ता का वो गुरूर साफ दिखता है जो अक्सर लंबी हुकूमत के बाद किसी भी दल में घर कर जाता है। लेकिन इस बार हवा का रुख कुछ अलग कहानी कह रहा है।

कांग्रेस इस दफा किसी शोर-शराबे में नहीं, बल्कि ‘साइलेंट मोड’ में शतरंज की बिसात बिछा रही है। यह खामोशी हार मान लेने की नहीं, बल्कि उस मंझे हुए अभिनेता की तरह है जो संवाद बोलने से पहले चेहरे के भावों से माहौल बनाता है। कांग्रेस के सामने तीस साल के इस सियासी सूखे को खत्म करने का इससे मुफीद मौका शायद ही दोबारा मिले।

वजहें बिल्कुल साफ हैं। पहली— परिसीमन के बाद जुड़े 10 नए वार्ड, जिनमें एससी, एसटी और ओबीसी तबके का नया सामाजिक संतुलन शहर के पुराने ढर्रे को चुनौती दे रहा है। दूसरी— तीन दशकों की सत्ता से उपजी स्वाभाविक ‘एंटी-इन्कंबेंसी’ और भाजपा के भीतर टिकट वितरण के ‘फोन कॉल कल्चर’ से भड़की अंदरूनी बगावत की चिंगारी।

लेकिन जैसा कि हर क्लासिक ड्रामे में होता है, असली इम्तिहान खुद से लड़ने का होता है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा जोखिम भाजपा नहीं, बल्कि उसकी अपनी पुरानी रिवायत— यानी ऐन वक्त पर सिर उठाने वाला भितरघात और असंतोष है। अगर दबी जुबान से उठ रही बगावत की इन सुगबुगाहटों को समय रहते नहीं साधा गया, तो हाथ आया मौका रेत की तरह फिसल भी सकता है।

उदयपुर की सियासत आज उस दोराहे पर खड़ी है जहां भाजपा अपनी तीन दशक पुरानी विरासत बचाने के दबाव में है, तो कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं और पाने को पूरा आसमान है। अब देखना यह है कि कांग्रेस की यह ‘खामोश तैयारी’ तीस साल की सत्ता विरोधी लहर को अपने पक्ष में मोड़कर इतिहास रचती है, या फिर यह कहानी भी किसी पुरानी फिल्म के री-रन जैसी ही साबित होती है।

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