कांग्रेस में नए चेहरों की स्टारकास्ट : जब स्थापित सितारों ने छोड़ा मैदान, नए चेहरों की आशिकी और लेकसिटी का सियासी बॉक्स ऑफिस

सैयद हबीब, उदयपुर।

सिनेमा का एक बहुत पुराना और बुनियादी दस्तूर है—जब कोई बड़ा बैनर किसी बहुचर्चित फिल्म के लिए स्थापित सितारों की जगह नए चेहरों को कास्ट करता है, तो आलोचक पहले ही दिन फिल्म को ‘फ्लॉप’ करार दे देते हैं। झीलों के शहर उदयपुर में नगर निगम चुनाव की सियासी पटकथा में ठीक यही दृश्य इन दिनों जीवंत हो उठा है। कांग्रेस ने अपने 80 वार्डों की बहुप्रतीक्षित सूची जारी कर दी है। सूची के सार्वजनिक होते ही राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर खुद पार्टी के कार्यकर्ताओं तक के चेहरे पर असंतोष की लकीरें तैरने लगी हैं।

राजनीतिक गलियारों में पहली प्रतिक्रिया यही आई कि कांग्रेस ने नामांकन दाखिल होने से पहले ही भाजपा को ‘वॉकओवर’ दे दिया है।

लगातार छह बोर्ड बनाकर तीन दशकों से काबिज भाजपा का अति-आत्मविश्वास इस सूची के बाद सातवें आसमान पर पहुंच चुका है। शहर में यह चर्चा आम हो गई है कि नगर निगम में भाजपा का ‘सातवां बोर्ड’ बनना अब महज एक औपचारिकता भर रह गया है। लेकिन सियासत की इस शतरंज में एक कड़वा और अनदेखा सच यह भी है कि इस दंगल में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। पिछले तीस सालों के छह बोर्डों में जितने वार्ड कांग्रेस जीतती आई है, अपनी न्यूनतम सांगठनिक ताकत के दम पर वह उतनी सीटें तो वैसे भी निकाल ही लेगी।

सवाल उठता है कि आखिर कांग्रेस की सूची में यह ‘नए और सामान्य चेहरों’ की भरमार क्यों है?

नेपथ्य की हकीकत यह है कि कांग्रेस के स्थापित और कद्दावर सिपहसालार चुनावी समर में उतरने का हौसला ही नहीं जुटा पाए। हार का खौफ ऐसा था कि दिग्गजों ने मैदान छोड़ना ही बेहतर समझा। नतीजा यह हुआ कि भाजपा के सबसे भारी-भरकम और मेयर पद के प्रबल दावेदारों के सामने कांग्रेस ने बिल्कुल अनजाने चेहरों को उतार दिया। जहां भाजपा के दिग्गज पारस सिंघवी के सामने सुंदरलाल वसीटा को उतारा गया है, वहीं संगठन के माहिर प्रमोद सामर के मुकाबले गजेंद्र सिंह शक्तावत को मोर्चे पर खड़ा किया गया है। ऊपर से देखने पर यह बेमेल मुकाबला लगता है—जैसे किसी महाबली के सामने कोई नया खिलाड़ी।

मगर इतिहास और सिनेमा दोनों ही गवाह हैं कि बॉक्स ऑफिस हमेशा स्थापित सितारों का मोहताज नहीं होता।

1988 में जब नासिर हुसैन ने नए-नवेले आमिर खान और जूही चावला को लेकर ‘कयामत से कयामत तक’ बनाई थी, या 1990 में महेश भट्ट ने बिल्कुल अनजान राहुल रॉय और अनु अग्रवाल के साथ ‘आशिकी’ का पर्दा उठाया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि ये सामान्य चेहरे बॉक्स ऑफिस के सारे स्थापित रिकॉर्ड ध्वस्त कर देंगे। जनता कब किस सादगी और नए चेहरे से कनेक्ट कर जाए, इसका फॉर्मूला किसी निर्देशक या सियासी पंडित के पास नहीं होता।

उदयपुर की जनता इस समय भाजपा के तीन दशक लंबे शासन के अति-उत्साह और कांग्रेस के इन नए चेहरों के अनूठे प्रयोग के बीच खड़ी है। क्या कांग्रेस के ये ‘अंडरडॉग’ प्रत्याशी राजनीति के बॉक्स ऑफिस पर कोई ‘कयामत’ ला पाएंगे या फिर भाजपा की स्थापित स्टार कास्ट सातवीं बार अपनी सत्ता का परचम लहराएगी—यह फैसला अब लेकसिटी की जनता रूपी दर्शक दीर्घा के हाथ में है।

 

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