
सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर।
उदयपुर की झीलों में केवल पानी का ही ज्वार-भाटा नहीं उठता, इन दिनों वहां राजनीति की तरंगें भी खूब हिलोरें ले रही हैं। नगर निगम के इस चुनावी समर में यों तो कई चेहरे तैर रहे हैं, लेकिन वार्ड क्रमांक 78 के भाजपा प्रत्याशी अतुल चंडालिया पर नज़र टिकना स्वाभाविक है।
अतुल केवल इसलिए चर्चा में नहीं हैं कि वे पंजाब के राज्यपाल और राजस्थान की राजनीति के शिखर पुरुष गुलाबचंद कटारिया के दामाद नितुल चंडालिया के अनुज हैं, बल्कि इसलिए भी हैं कि शहर के प्रबुद्ध नागरिक उनमें भावी महापौर की स्वाभाविक संभावनाएं देख रहे हैं। आचरण में सहजता, वाणी में मर्यादा, संगठन का व्यावहारिक कौशल और पुरुषार्थ—ये चारों गुण उनमें एक साथ दिखाई पड़ते हैं। रणक्षेत्र में उतरने वाले किसी भी गंभीर योद्धा की तरह उनके चेहरे पर विजय का अडिग विश्वास तो है ही, साथ ही लोकतंत्र की अनिश्चितताओं से उपजी सजगता की बारीक रेखाएं भी हैं। सामने कांग्रेस के रमेश डांगी हैं और क्षेत्र में डांगी समाज का सघन प्रभाव भी एक जीवंत तथ्य है।
जब मेरी उनसे भेंट हुई, तो दृश्य अत्यंत आत्मीय और भारतीय लोक-परंपरा के अनुकूल था। कार्यकर्ताओं का मेला, सादगीपूर्ण पांडाल, भोजन-जल की व्यवस्था और बीच-बीच में मीडिया से संवाद। चुनावी आपाधापी के बीच जब मैंने उनसे उनके संकल्पों पर बात की, तो उनके उत्तर किसी रटे-रटाए नेता के खोखले वादे नहीं, बल्कि एक दृष्टि संपन्न नगर-शिल्पी के विचार लगे।
अतुल ने कहा कि यह वार्ड क्षेत्रफल में विशाल है, अतएव यहां सृजन के अवसर भी असीम हैं। चूंकि यह इलाका हाल ही में निगम सीमा में जुड़ा है, इसलिए यहां नए सिरे से आधारभूत ढांचा खड़ा करना होगा। पेयजल संकट के स्थायी समाधान हेतु उच्च दबाव वाली कम से कम दो नई टंकियों का निर्माण और नई कॉलोनियों में पार्कों का हरित विकास उनकी प्राथमिकताओं में है।
किंतु जो बात मुझे सबसे अधिक गहराई से छू गई, वह थी यहां के किसानों और मूल निवासियों के प्रति उनकी संवेदनशीलता। यूडीए (UDA) द्वारा भूमि अधिग्रहण और बची हुई जमीनों के रूपांतरण (कन्वर्जन) पर थोपी गई अत्यधिक दरों की पीड़ा को उन्होंने जिस शिद्दत से उठाया, वह काबिले-तारीफ है। उन्होंने स्पष्ट कहा—”यह गरीब और मध्यमवर्गीय किसान इतनी भारी दरें कहां से चुकाएगा? इसके लिए मुझे स्थानीय स्तर से लेकर जयपुर के शासन सचिवालय तक संघर्ष करना पड़ा, तो मैं पूरी ताकत से लडूंगा।”
वे पर्यटन और पर्यावरण के बीच एक अद्भुत संतुलन साधते हैं। वार्ड में जल-क्रीड़ा (वाटर स्पोर्ट्स) गतिविधियों के विस्तार से युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खोलना चाहते हैं। नगर के व्यापक संदर्भ में बात चली, तो उन्होंने शहर की दमघोंटू यातायात व्यवस्था को वैज्ञानिक पद्धति से सुधारने, भ्रष्टाचार के समूल नाश के लिए ‘सिंगल विंडो सिस्टम’ लागू करने और पूर्वजों के बनाए ऐतिहासिक ‘गुलाबबाग’ की तर्ज पर नगर के नए कोनों में लघु गुलाबबाग विकसित करने का अनुपम विचार रखा।
उनका यह कथन कि “मतदाता यह देखें कि कौन उनकी आवाज को सत्ता के गलियारों तक गूंजने की सामर्थ्य रखता है”, उनकी निर्भीक सोच को दर्शाता है।
अतुल का यह आत्मविश्वास किसी दंभ से नहीं, बल्कि उनके जीवन-संघर्ष की भट्टी में तपकर निकला है। एक साधारण सरकारी शिक्षक के घर जन्म लेकर अभावों को निकट से देखना, स्थानांतरण के थपेड़े सहना, और वह दौर जब बड़े भाई को मात्र पाँच सौ रुपये मासिक पर काम करना पड़ा तथा स्वयं अतुल को सोलह वर्ष की कच्ची उम्र में सुखेर की धरती पर पसीना बहाना पड़ा—यह तपस्या ही आज उनके व्यक्तित्व को निखार रही है।
अभावों से निकलकर समृद्धि पाना और फिर उस सामर्थ्य को जनकल्याण के लिए समर्पित कर देना—यही भारतीय मनीषा का मूल तत्व है। अतुल चंडालिया का यह संकल्प उदयपुर की राजनीति में एक शुभ और सार्थक संकेत है।
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