
सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर
झीलों की नगरी उदयपुर के नगर निगम समर में वार्ड संख्या 59 का चुनावी दंगल इस बार खासी सियासी हलचल पैदा कर रहा है। अनुसूचित जाति (महिला) आरक्षित इस वार्ड की बिसात पर चार महिला प्रत्याशी आमने-सामने हैं। मुकाबला न सिर्फ प्रतिष्ठा का है, बल्कि पारंपरिक सियासी किले को बचाने और नए समीकरणों को साधने की जद्दोजहद भी साफ झलक रही है।
इतिहास गवाह रहा है कि यह क्षेत्र भाजपा के मजबूत आधार वाले इलाकों में शुमार रहा है। इस बार पार्टी ने सारिका सालवी पर दांव खेला है, जिनके पति बलवंत ओझा भाजपा युवा मोर्चा के सक्रिय पदाधिकारी रहे हैं। पारिवारिक संगठनात्मक पृष्ठभूमि का लाभ सारिका को मिलता दिख रहा है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने विनिया सालवी को मैदान में उतारकर मुकाबले को जातीय और दलीय दोनों स्तरों पर धारदार बना दिया है।
सियासी समीकरणों में असली पेच फंसाया है हालिया परिसीमन ने। नए भौगोलिक दायरे ने भाजपा के तयशुदा वोट बैंक में सेंध लगा दी है, जिससे पार्टी रणनीतिकारों के माथे पर सिलवटें आ गई हैं। हालांकि, मैदान में अनिता हरिजन और कंकू बाई कालबेलिया की निर्दलीय मौजूदगी से वोटों के ध्रुवीकरण और बिखराव की पूरी गुंजाइश बन गई है। भाजपा खेमे का मानना है कि निर्दलीयों की यह ताल ठोंक अंततः कांग्रेस के पारंपरिक जनाधार को काटकर उनके लिए ‘डैमेज कंट्रोल’ का जरिया साबित हो सकती है।
प्रचार में बराबरी, संगठन की ढाल बनाम मुद्दों की धार
धरातल पर कांग्रेस और भाजपा दोनों ही प्रत्याशियों का प्रचार अभियान कदम से कदम मिलाता नजर आ रहा है। निर्दलीय भी अपनी-अपनी बस्तियों में पूरी ताकत झोंक रहे हैं। भाजपा के पक्ष में सबसे बड़ा संबल उसका बूथ स्तरीय सुगठित नेटवर्क है, जो अंतिम समय में वोटर को पोलिंग बूथ तक खींचने में माहिर माना जाता है। इसके बावजूद, वार्ड की चौपालों और गलियारों में चर्चाएं यही हैं कि मुकाबला एकतरफा कतई नहीं है; कांटे की टक्कर तय है।
मूलभूत सुविधाओं का अभाव: दूरी और दरकार
राजनीतिक दावों के इतर वार्ड के भीतरी हालात बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते नजर आते हैं। शहर का बाहरी हिस्सा होने के चलते यहां सरकारी स्कूल जैसी अनिवार्य सेवाएं आज भी जनता की पहुंच से खासी दूर हैं। जनता को इलाज या बच्चों की तालीम के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है।
भाजपा प्रत्याशी सारिका सालवी से हुई बातचीत में यह जरूर स्पष्ट हुआ कि वे क्षेत्र की इन जमीनी दिक्कतों से भली-भांति वाकिफ हैं। उनका दावा है कि निर्वाचित होने पर वे वार्ड में समस्याओं के निराकरण को अपनी पहली प्राथमिकता बनाएंगी। अब देखना यह है कि मतदाता संगठनात्मक ढांचे पर भरोसा जताते हैं या फिर परिसीमन के नए समीकरण कोई नया इतिहास लिखते हैं।
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