
फोटो : कमल कुमावत
उदयपुर। कुदरत का दस्तूर भी कितना अजीब है, जब दिल का दर्द लफ्जों में बयां नहीं होता, तो कायनात खुद आंसुओं की शक्ल में बरस पड़ती है। मंगलवार को जब मेवाड़ पूर्व राजपरिवार की राजमाता विजयाराज कुमारी की अंतिम यात्रा निकली, तो आसमान भी अपने मेघों को रोक न सका। रिमझिम बारिश की बूंदें ऐसे गिर रही थीं मानो शहर की सिसकियों में आकाश भी अपना विलाप मिला रहा हो।
शंभू निवास पैलेस की चौखट से जब राजमाता की साढ़े चार किलोमीटर लंबी अंतिम यात्रा शुरू हुई, तो लेकसिटी का हर कोना ठहर-सा गया। सड़कों के दोनों ओर खड़े हजारों नम आंखों वाले लोग केवल एक पूर्व महारानी को नहीं, बल्कि उस ममतामयी छाया को विदा कर रहे थे जिसने शिक्षा और परोपकार से इस शहर के अनगिनत आंगनों को संवारा था। फूलों की बारिश के बीच जब वो कांधा आगे बढ़ा, तो सबकी निगाहें सिर्फ एक चेहरे पर टिकी थीं—डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़।
किसी भी बेटे के लिए जीवन का सबसे स्याह और भारी पल वो होता है, जब उसे अपनी उस मां को मुखाग्नि देनी पड़े जिसकी उंगली पकड़कर उसने दुनिया देखी थी। पिछले साल पिता अरविंद सिंह मेवाड़ का कंधा छूटा था, अभी उस घाव की टीस शांत भी नहीं हुई थी कि अब मां का आंचल भी सदा के लिए छिन गया। महासतिया की 425 साल पुरानी ऐतिहासिक छतरियों के साये में, जब वैदिक मंत्रोच्चार के बीच चिता पर अग्नि प्रज्वलित हुई, तो लक्ष्यराज सिंह अपने आंसुओं को रोक न सके। उनका सिर झुका और आंखें नम थीं—उस पल में न कोई राजसी ठाठ था, न कोई पद, केवल एक अनाथ हो चुका बेटा था जिसके दोनों संबल काल के प्रवाह में हमेशा के लिए विलीन हो गए।
बारिश की बूंदों में भीगती चिता की लपटें बता रही थीं कि एक गौरवशाली और वात्सल्य से भरा अध्याय आज पंचतत्व में समा गया। पिता के बाद मां की यह अंतिम विदाई लक्ष्यराज सिंह के जीवन में वो अथाह सूनापन छोड़ गई है, जिसे दुनिया की कोई दौलत या सम्मान कभी नहीं भर सकेगा।
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