उदयपुर कांग्रेस में पर्दे के पीछे की नूराकुश्ती : जब सिपहसालार ही जंग के मैदान से भाग खड़े हों

सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर

सिनेमा का एक बुनियादी फलसफा है—कमजोर पटकथा पर कभी ब्लॉकबस्टर फिल्म नहीं बनती। महबूब खान की ‘मुगल-ए-आजम’ में अगर जोधा और अकबर के साथ-साथ दुर्जन सिंह जैसे किरदार भी जान की बाजी न लगाते, तो संग्राम में वो तपिश पैदा न होती। मगर जब मुकाबले में एक पक्ष सिर्फ इसलिए कैमरे के सामने आए ताकि दूसरे का क्लोज-अप शॉट बेहतर दिख सके, तो दर्शक समझ जाते हैं कि यह लड़ाई नहीं, ‘फिक्स्ड मैच’ है।

झीलों की नगरी उदयपुर के नगर निगम चुनाव के परिणाम सामने आए हैं। भारतीय जनता पार्टी लगातार सातवीं बार पूरे शानो-शौकत के साथ अपना बोर्ड बनाने जा रही है। भाजपा की जीत के राजनीतिक विश्लेषक सौ कारण गिना सकते हैं, मगर कांग्रेस की इस सातवीं दुर्गति का अगर एक ही कारण तलाशना हो, तो वो खुद कांग्रेस और उसके ‘ड्राइंग-रूम सूरमा’ हैं। सातवीं बार एक ही ढर्रे पर चित होना कोई चुनावी हार नहीं है; यह तो उस अखाड़े का तमाशा है जहां पहलवान पहले से तय करके उतरा हो कि उसे चित ही होना है। ऐसी शर्मनाक निरंतरता के बाद तो सियासत के तालाब में चुल्लूभर पानी तलाशना भी बेमानी सा लगता है।

अक्सर देखा जाता है कि मुकाबला जीतने के लिए लड़ा जाता है, लेकिन उदयपुर कांग्रेस के रंग-ढंग देखकर लगता है कि उनका एकमात्र मकसद भाजपा की राह को मखमली बनाना था। जब सेनापति खुद बंकरों में छुप जाएं और पैदल सिपाहियों को तोपों के मुंह पर धकेल दें, तो शिकस्त तय होती है। हार का ऐसा खौफ कि पार्टी के तथाकथित दिग्गज चुनाव मैदान की दहलीज तक लांघने से कांपते रहे।

जरा देखिए, जहां जज्बा था, वहां जमीन ने जवाब दिया। जब शहर जिलाध्यक्ष फतह सिंह राठौड़ की पत्नी डॉ. पूनम राठौड़ मैदान में उतरकर जीत सकती हैं, लगातार दूसरी बार अपनी मेहनत के बूते अरुण टांक परचम लहरा सकते हैं, तो बाकी दिग्गजों को किस अनहोनी का डर सता रहा था? पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. गिरिजा व्यास की भतीजा बहू डॉ. हितांशी शर्मा ने तीखी बयानबाजियों के बीच मुकाबला जीता, बड़गांव से संजय शर्मा लगातार जनता से जुड़कर अपनी साख साबित कर रहे हैं।

और सबसे बड़ा सबक तो वार्ड 22 से जीतकर आए हिदायत तुल्ला ने दिया। वे उस वार्ड में ताल ठोकने पहुंचे जहां मुस्लिम आबादी से ज्यादा हिंदू मतदाता थे। पुराना इलाका छोड़कर नए आंगन में गए, ‘बाहरी’ होने के ताने सहे, मगर लोगों के सुख-दुख में शरीक होकर उनका दिल जीत लिया। जब एक नेता बिना किसी धार्मिक या सामाजिक बैसाखी के सिर्फ अवाम के बीच अपनी जगह बना सकता है, तो फिर कांग्रेस के बाकी नेताओं के पांव क्यों कांप रहे थे?

असल में, कांग्रेस की फेहरिस्त उन नामों से भरी पड़ी है जो सिर्फ प्रेस नोट जारी करने और बैठकों में चाय की चुस्कियां लेने तक सीमित हैं। इम्तिहान की इस घड़ी में जिन्हें भाजपा के दिग्गजों के सामने दो-दो हाथ करने थे, वे नदारद रहे।

पंकज शर्मा जैसे चेहरे, जो हर मोर्चे पर आगे रहने का दावा करते हैं, वे मैदान से गायब दिखे। राजीव सुहालका, खूबीलाल मेनारिया, सुरेश श्रीमाली, दिनेश श्रीमाली, दीपक सुखाड़िया, अजय पोरवाल, दीपक व्यास, विनोद पानेरी, कृष्णकांत और केजी मूंदड़ा जैसे नेताओं की भारी-भरकम टोली अगर वार्डों में उतरती और भाजपा के बुर्जों को सीधे चुनौती देती, तो आज कांग्रेस 23 सीटों की लाचारी पर आंसू बहाने के बजाय 50-55 के पार खड़ी दिखाई देती।

दिलीप कुमार की फिल्म ‘लीडर’ का एक अमर संवाद था कि नेता वो नहीं जो जनता को पीछे छोड़े, नेता वो है जो आंधियों में सबसे आगे सीना ताने। उदयपुर कांग्रेस के ये स्वयंभू नेता शायद उस फलसफे को भूलकर सिर्फ एयर-कंडीशन कमरों में पार्टी के वजूद का कसीदा पढ़ते रहे। जब तक जंग से डरने वाले ये ‘कागजी सिपहसालार’ नेपथ्य में नहीं धकेले जाएंगे, तब तक उदयपुर के इस सियासी परदे पर क्लाइमैक्स कभी नहीं बदलेगा—तस्वीर वही रहेगी, जो पिछले तीस सालों से दोहराई जा रही है।

 

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