
उदयपुर। सिनेमा का पर्दा जब उठता है, तो दर्शक केवल उस नायक को देखता है जो रोशनी के घेरे में खड़ा होकर संवाद बोल रहा होता है। ताली उसी के नाम पर बजती है, हार उसी के गले में पड़ते हैं। लेकिन राजकपूर से लेकर ऋषिकेश मुखर्जी तक के सिनेमा को गहराई से महसूस करने वाला हर शख्स जानता है कि परदे पर दिखने वाली चमक दरअसल कैमरे के पीछे खड़े उस शख्स की होती है, जिसके हाथ में स्क्रिप्ट का हर पन्ना और रोशनी का हर कोण पहले से तय होता है। हॉलीवुड की क्लासिक फिल्म ‘द गॉडफादर’ में एक किरदार था—टॉम हेगन। वह कभी डॉन नहीं बना, न ही उसने कभी खुद को सामने रखकर तालियां बटोरीं, मगर परिवार के हर बड़े फैसले, हर जीत और हर रणनीति की सांसें उसी के फैसलों से चलती थीं।
झीलों की नगरी उदयपुर के नगर निगम चुनाव के परिणाम जब सामने आए, तो आंकड़ों के महासागर में तैरते 80 वार्डों के बीच एक नंबर ऐसा उभरा जिसने हर चुनावी पंडित को ठिठकने पर मजबूर कर दिया। वार्ड संख्या 19 जिसमें हाथीपोल, मालदास स्ट्रीट, मोती चौहट्टा आदि क्षेत्र में है। यहां से भारतीय जनता पार्टी के कुंदन चौहान ने पूरे शहर में प्रतिशत के लिहाज से सबसे बड़ी और ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। 3,156 कुल वैध मतों में से 2,634 वोट हासिल कर 83.46 फीसदी का जो जादुई आंकड़ा उन्होंने छुआ है, वह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि अवाम के एकतरफा समर्पण का दस्तावेज है। शहर के किसी भी अन्य वार्ड का कोई भी सूरमा इस ऊंचाई तक नहीं पहुँच सका।

मगर इस शानदार दृश्य के पीछे का यथार्थ क्या है? क्या यह करिश्मा केवल उस चेहरे का है जो मतपत्र पर छपा था?
राजनीति के जानकार भली-भांति जानते हैं कि इस वार्ड की जमीन पर बरसों से एक ऐसा किरदार सक्रिय रहा है, जिसने कभी खुद को मंच के केंद्र में नहीं रखा, मगर जिसने दशकों तक वार्ड पार्षद से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक के सियासी दंगल में पार्टी के उम्मीदवारों की विजय गाथा लिखी है। वह उस कुशल सूत्रधार की तरह है जो मंच के पीछे खड़े होकर नेपथ्य से डोर खींचता है और मंच पर कठपुतलियां बाकायदा तालियों की गड़गड़ाहट बटोरती हैं। उसकी खामोश मौजूदगी, गली-मोहल्लों के हर घर की नब्ज पर उसकी पकड़ और संगठन के ताने-बाने को साधने का हुनर ही वह अदृश्य पूंजी है, जो किसी भी सामान्य चेहरे को 83 फीसदी के एवरेस्ट पर बिठा देती है।
अक्सर सियासत में लोग पद पाकर अपनी हस्ती का गुमान करने लगते हैं, मगर इतिहास हमेशा उन ‘किंगमेकर्स’ को सलाम करता है जो खुद साये में रहकर दूसरों के माथे पर तिलक लगाते हैं। वार्ड 19 का यह 83.46 प्रतिशत का जनादेश दरअसल उस खामोश तपस्या का ब्याज है, जो दशकों से शहर की गलियों में बिना किसी तामझाम के जमा की जा रही थी। सिनेमा के सुनहरे दौर का वह गीत अनायास ही याद आता है—’मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के…’। यहाँ भी देखने वाले सिर्फ आगे दौड़ते रथ को देख रहे हैं, जबकि असली सारथी तो बहुत खामोशी से अपना काम मुकम्मल कर चुका है।
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