
उदयपुर। महलों की ऊंची प्राचीरें कितनी भी मजबूत क्यों न हों, वे उस सूनेपन को नहीं भर सकतीं जो मां की ममता के बिछड़ने से पैदा होता है। झीलों की नगरी उदयपुर आज एक गहरे, मौन शोक में डूबी है। मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार की विजयाराज कुमारी मेवाड़ के देवलोकगमन के साथ ही राजमहल की चौखट से वात्सल्य का वह अंतिम आंचल भी छिन गया, जिसकी छांव में पीढ़ियां सुरक्षित महसूस करती थीं।
पिता स्वर्गीय अरविंद सिंह मेवाड़ के अवसान का घाव अभी सूखा भी नहीं था कि नियति ने डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के सिर से मां का साया भी छीन लिया। किसी भी संतान के जीवन में इससे बड़ा वज्रपात क्या हो सकता है कि देखते ही देखते उसके सिर पर रखा माता और पिता दोनों का स्नेहमयी हाथ हमेशा के लिए उठ जाए। राजसी ठाठ-बाट, परंपराओं का गौरव और जिम्मेदारियों का विशाल दायरा अपनी जगह है, मगर जब घर का वो कोना सूना हो जाता है जहां मां हर परेशानी को एक मुस्कान से हर लेती थी, तो इंसान महलों के बीच भी खुद को पूरी तरह अकेला महसूस करता है।
83 वर्ष की आयु में अंतिम सांस लेने वाली विजयाराज कुमारी सिर्फ एक राजघराने की मर्यादा नहीं थीं, वे उस आंगन की जीवनदायिनी डोर थीं जिसने हर परिस्थिति में परिवार को संस्कारों और संवेदनाओं से बांधे रखा। कच्छ के राजपरिवार से आकर मेवाड़ के गौरवशाली आंगन को अपना बनाने वाली राजमाता ने आजीवन परोपकार, शिक्षा और सादगी को ही अपना आभूषण माना। महाराणा मेवाड़ पब्लिक स्कूल के प्रांगण में गूंजती बच्चों की किलकारियों से लेकर समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण तक, उनके स्नेह की छाया हर ओर महसूस की जाती थी।
मंगलवार की सुबह जब सिटी पैलेस से उनकी पार्थिव देह महासतियाजी के लिए रवाना होगी, तो वह सिर्फ एक देह की अंतिम यात्रा नहीं होगी, बल्कि एक युग की विदाई होगी। लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के कंधों पर आज सिर्फ मेवाड़ की विरासत का भार नहीं, बल्कि दोनों पूज्यों को खो देने का वह असहनीय सन्नाटा भी है, जिसे दुनिया के किसी भी शब्द से बयां नहीं किया जा सकता। राजमहल के झरोखों से छनकर आती हवा भी आज आंसुओं में भीगी सी महसूस हो रही है, मानो पूरा मेवाड़ अपने लाडले के इस अथाह दर्द में उसके साथ खामोश खड़ा हो।
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