शिक्षा, अध्यात्म और संस्कृति के सच्चे प्रहरी : डॉ. प्रदीप कुमावत को श्री गुरु एवं ‘मालव राज अलंकरण’ सम्मान

सैयद हबीब/कमल कुमावत उदयपुर।

कभी-कभी किसी व्यक्ति का पूरा जीवन समाज और राष्ट्र को नई दिशा देने की एक जीती-जागती पाठशाला बन जाता है। उदयपुर की पावन भूमि पर रविवार को एक ऐसा ही प्रेरणादायी दृश्य देखने को मिला, जब शिक्षा, अध्यात्म और भारतीय संस्कृति के संवर्धन में आजीवन समर्पित प्रबुद्ध चिंतक डॉ. प्रदीप कुमावत को रतलाम राजवंश और महामंडलेश्वर सोमेश्वर गिरिजी बिजलोई आश्रम की ओर से गरिमामयी अलंकरणों से विभूषित किया गया।

आलोक हिरण मगरी के विवेकानंद सभागार में आयोजित इस विशेष समारोह में रतलाम राजवंश के महाराजा श्री राम लक्ष्मण सिंह जी ने अपने करकमलों से डॉ. कुमावत को ‘श्री गुरु डॉक्टर प्रदीप’ की उपाधि और प्रतिष्ठित ‘मालव राज अलंकरण’ प्रदान किया। इस दौरान उन्हें प्रशस्ति पत्र, उपरणा और प्रतीक चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।

वैचारिक गहराई और राष्ट्रबोध का सम्मान

यह केवल एक व्यक्ति का अभिनंदन नहीं था, बल्कि उस वैचारिक साधना का सम्मान था, जिसे डॉ. कुमावत ने दशकों से शिक्षा और संस्कारों की त्रिवेणी बहाकर सींचा है। महाराजा राम लक्ष्मण सिंह जी ने अपने संबोधन में बिल्कुल सही रेखांकित किया कि डॉ. कुमावत ने अध्यात्म और महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों की गौरवगाथाओं को जन-जन तक पहुँचाने का जो भागीरथ प्रयास किया है, वह आज के दौर में अनुकरणीय है।

यह सम्मान मूल रूप से वर्ष 2025 में ही तय हुआ था, लेकिन किन्हीं कारणों से औपचारिकताएं उदयपुर में आज पूरी हुईं। इससे यह सिद्ध होता है कि सच्चे कर्मयोगियों का यश और उनका योगदान समय की सीमाओं से परे होता है।

शिक्षा, संस्कृति और मानवता का समन्वय

समारोह के दौरान महाराजा राम लक्ष्मण सिंह जी का यह कथन अत्यंत विचारणीय है कि मानवता की सच्ची सेवा ही मनुष्य का मूल धर्म है। आज जब शिक्षा मात्र साक्षरता या उपाधियां हासिल करने का साधन बनकर रह गई है, तब इस बात को गहराई से समझने की आवश्यकता है कि भारतीय संस्कृति के तमाम आयाम शिक्षा से जुड़ें। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बालकों में मानवीय मूल्यों, संस्कारों और राष्ट्रभक्ति का बीज बो सके।

कार्यक्रम में अखिल भारतीय नववर्ष समारोह समिति, हमारा समृद्ध और आलोक संस्थान के उन तमाम प्रयासों की भी सराहना हुई, जो भारतीय नववर्ष और सांस्कृतिक जागरण के लिए निरंतर संघर्षरत हैं।

प्रारंभ में आलोक संस्थान के विद्यार्थियों द्वारा महाराजा का पारंपरिक स्वागत किया गया, जबकि कार्यक्रम का संचालन प्रीति कुमावत ने बहुत ही सधे हुए अंदाज़ में किया। इस आयोजन ने एक बार फिर यह याद दिलाया कि जब समाज अपने सच्चे साधकों और शिक्षकों का सम्मान करता है, तो वह समाज और राष्ट्र दोनों की बौद्धिक एवं नैतिक नींव को मजबूत करता है। डॉ. प्रदीप कुमावत का यह अभिनंदन हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो मौन रहकर राष्ट्र और संस्कृति की सेवा में जुटा है।

 

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