सियाणा के खेतों से नागोया के पोडियम तक: माहेश्वरी चौहान की बंदूक ने लिखी उम्मीद और हौसले की नई इबारत

सैयद हबीब, उदयपुर
खेल में कभी-कभी हार का अंतर इतना महीन होता है कि वह खिलाड़ी की रूह को झकझोर देता है। जब पेरिस ओलंपिक के क्ले टारगेट रेंज पर पदक महज चंद निशानों के फासले से हाथ से फिसल गया था, तो किसी भी एथलीट के लिए उस खालीपन से उबरना आसान नहीं होता। मगर असली चैंपियन की पहचान यही है कि वह मलबे में बैठकर मातम नहीं मनाता, बल्कि उसी निराशा को अपने अगले अभियान का बारूद बना लेता है।

जापान के आइची-नागोया में एशियन गेम्स 2026 के मंच पर माहेश्वरी चौहान ने ठीक यही कर दिखाया। शनिवार को जब यह कांस्य पदक विजेता निशानेबाज झीलों की नगरी उदयपुर की सरजमीं पर उतरी, तो डबोक एयरपोर्ट से लेकर फतहसागर के राज बाग तक का मंजर सिर्फ एक खिलाड़ी की अगवानी नहीं था—वह एक ऐसे अटूट जज्बे का जश्न था, जिसने पेरिस के जख्मों पर नागोया में पोडियम फिनिश की मरहम लगाई।

स्कीट शूटिंग एकाग्रता, टाइमिंग और लोहे जैसे स्नायुओं (nerves of steel) का इम्तिहान है। हवा में उड़ती उस मिट्टी की तश्तरी को एक सेकंड के सौवें हिस्से में भांपना और सटीक प्रहार करना—यही माहेश्वरी का हुनर है। विमेंस स्कीट टीम स्पर्धा में जब दबाव अपने चरम पर था, तब माहेश्वरी, राइजा ढिल्लों और परिनाज धालीवाल की त्रिमूर्ति ने 331 अंकों का संयुक्त स्कोर खड़ा कर भारत की झोली में वह ऐतिहासिक ब्रॉन्ज मेडल डाल दिया। चीन और कजाकिस्तान जैसी दिग्गजों के बीच यह पोडियम फिनिश भारतीय निशानेबाजी की गहराई का सुबूत है, जिसकी तारीफ में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी एकाग्रता और टीमवर्क को सराहा।

लेकिन एक खेल पत्रकार के तौर पर मेरे लिए इस पदक की चमक सिर्फ स्कोरबोर्ड के 331 अंकों तक सीमित नहीं है; इसकी असली खूबसूरती उस सफर में है जो जालोर के छोटे से गांव सियाणा की पगडंडियों से शुरू हुआ था।

हमारे देश में अक्सर बेटियों की शादी के बाद खेल के जूते और किटबैग खूंटी पर टांग दिए जाते हैं। मगर माहेश्वरी की दास्तान भारतीय खेल समाज के बदलते चेहरे की एक रोशन मिसाल है। जालोर में दादा गणपत सिंह की प्रेरणा और पिता प्रदीप सिंह चौहान का वह अटूट भरोसा, जिन्होंने बेटी के सपनों के लिए गांव में ही शूटिंग रेंज खड़ी कर दी। और फिर शादी के बाद उदयपुर का वह ससुराल—जहां ससुर राघवेंद्र सिंह राठौड़ (अध्यक्ष, राजसमंद राइफल एसोसिएशन) और पति अधिराज सिंह ने उन्हें सिर्फ ‘बहू’ नहीं, बल्कि देश की उम्मीद के तौर पर देखा। केलवा की शूटिंग रेंज पर अनगिनत घंटों तक क्ले कबूतरों को हवा में उड़ाते हुए माहेश्वरी ने जो पसीना बहाया, यह पदक उसी पारिवारिक यकीन का नतीजा है।

जब फतहसागर के किनारे उन्हें महाराणा प्रताप का स्मृति चिन्ह सौंपा गया, तो माहौल में एक अलग ही भावनात्मक गूंज थी। यह उस खिलाड़ी का सम्मान था जिसने सुविधा और साधन के अभावों को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।

माहेश्वरी की यह उपलब्धि राजस्थान और पूरे देश की उन हजारों लड़कियों के लिए एक नजीर है जो बंद कमरों में बड़े ख्वाब देखती हैं। यह बताता है कि अगर परिवार का साथ हो और सीने में कुछ कर गुजरने की आग, तो सियाणा जैसे किसी गुमनाम गांव की मिट्टी से निकलकर भी जापान की धरती पर तिरंगा फहराया जा सकता है। नागोया में माहेश्वरी की नाल से निकला यह कांस्य सिर्फ एक मेडल नहीं, बल्कि भारतीय निशानेबाजी के सुनहरे कल का खुला पैगाम है।

 

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