
उदयपुर। हमारे मुल्क में सरकारी बैठकों का एक तयशुदा दस्तूर रहा है—चाय की चुस्कियां, समोसों की महक, अफ़सरों के लंबे-चौड़े वादे और फिर फाइलों पर धूल जमने का लंबा सिलसिला। मंगलवार को जब उदयपुर में पुलिस कप्तान और नए मेयर साहब ट्रैफिक सुधारने और अतिक्रमण हटाने की कसम खा रहे थे, तो मुझे लगा कि यह भी उन तमाम मुलाकातों जैसी ही एक रस्म होगी जिसका नतीजा अक्सर सिफर निकलता है।

मगर बुधवार की सुबह लेकसिटी के बाज़ारों ने जो मंज़र देखा, उसने मेरी इस पुरानी बदगुमानी को गलत साबित कर दिया।
मंगलवार को दिए गए बयानों की स्याही अभी अखबारों में पूरी तरह सूखी भी नहीं थी कि बुधवार को नगर निगम की पीली गाड़ियां और पुलिस का भारी अमला सीधे सड़कों पर उतर आया। नए मेयर पारस सिंघवी ने यह साबित कर दिया कि वे सिर्फ ड्राइंग रूम में बैठकर तकरीरें करने वाले राजनेता नहीं हैं। वे 30 सालों से इसी सिस्टम में काम कर रहे हैं और गहराई तक रुबरु हैं। देहली गेट से लेकर सूरजपोल तक—जो इलाका सालों से दुकानदारों और ठेलों की मनमर्जी का बंधक बना हुआ था—वहां निगम के दस्ते ने कानून की हकीकत समझा दी।

मयूर जूस, पंजाब साइकिल, बॉम्बे प्लास्टिक और रमेश पेंट्स के बाहर जिस तरह सामान सड़कों को निगल रहा था, निगम की टीम ने राजस्व अधिकारी नितेश भटनागर और उनकी टोली के साथ मिलकर उस सारे फैलाव को पलक झपकते ही जब्त कर लिया। पंजाब नेशनल बैंक की गली में लगने वाले ठेलों का मजमा भी साफ कर दिया गया। राहगीर और गाड़ी वाले, जो इस रास्ते पर हर रोज घिसट-घिसट कर चलने को मजबूर थे, आज राहत की सांस लेते दिखाई दिए।
लेकिन यह सफाई सिर्फ बापू बाजार तक सीमित नहीं रही। शहर के दूसरे कोने—सेक्टर 11 में इंडियन ऑयल डिपो के सामने—यूडीए से निगम को मिली दुकानों के बाहर कबाड़ियों ने जो अपना अवैध साम्राज्य फैला रखा था, वहां भी निगम ने करारा प्रहार किया। चार बड़े डंपर भरकर कबाड़ जब्त किया गया। सोचिए, सार्वजनिक जमीन पर कबाड़ का पहाड़ खड़ा करके शहर की सांसें रोकी जा रही थीं!
मेयर सिंघवी का यह कहना बिल्कुल मुनासिब है कि शहर की सड़कें और चौराहे किसी की बपौती नहीं, बल्कि पूरे अवाम के लिए हैं। उन्होंने समझाइश भी दी और चेतावनी भी—”या तो खुद समेट लो, वरना निगम का डंडा अपना काम करेगा।”
सड़कों पर पसरे इस अवैध फैलाव को समेटना कोई आसान काम नहीं है, क्योंकि हमारे यहां अतिक्रमण को लोग अपना पैदाइशी हक समझ बैठते हैं। लेकिन जब निगम और खाकी मिलकर नीयत साफ कर लें, तो रास्ते चौड़े होते देर नहीं लगती। लेकसिटी अब धीरे-धीरे अपनी खोई हुई खूबसूरती और सुघड़ता की तरफ लौट रही है, और यह शहर के बाशिंदों के लिए एक बेहद सुकून भरी शुरुआत है।
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