अलविदा नाना : एक आग थी जो बुझ गई…

सैयद हबीब, उदयपुर

सिनेमा का परदा हमेशा खूबसूरत और सजे-संवरे चेहरों का मोहताज रहा है। वहां अदाएं बेची जाती हैं, नफासत की नुमाइश होती है और तालियों के लिए मीठे बोल बोले जाते हैं। लेकिन इस मायावी तिलिस्म के बीच कभी-कभार कोई ऐसा फकीर उतर आता है, जो न तो किसी तयशुदा सांचे में ढलता है और न ही तालियों की भीख मांगता है। वह बस अपनी ही धुन में जलता हुआ अंगारा होता है। विश्वनाथ गजानन पाटेकर, जिन्हें दुनिया ‘नाना’ के नाम से जानती थी, सिनेमाई कैनवास पर खींची गई वही सबसे तल्ख और सच्ची लकीर थे। आज सुबह गोवा के डोना पाउला से आई खबर ने दिल को उसी तरह खाली कर दिया, जैसे किसी पुराने, वीरान थियेटर की बत्ती अचानक गुल हो गई हो।

गुरुवार की भोर में कार्डियक अरेस्ट ने उस सीने की धड़कनें थाम दीं, जिसके भीतर जिंदगी भर एक बेचैन तूफान उमड़ता रहा। डॉक्टर 45 मिनट तक सीपीआर देते रहे, मगर शायद मुकद्दर के डायरेक्टर ने अपनी स्क्रिप्ट का आखिरी सीन पहले ही लिख दिया था। सुबह 5:20 बजे मणिपाल अस्पताल में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। एक भरा-पूरा, तल्ख और बेबाक जीवन भौतिक रूप से शांत हो गया।

नाना का सफर किसी मुकम्मल और दर्दनाक क्लासिक फिल्म जैसा रहा है। 1 जनवरी 1951 को जन्मे नाना ने जिंदगी को कभी मखमली गद्दों पर नहीं देखा। जब वे 28 बरस के थे, पिता गजानन पाटेकर का साया उठ गया। मुंबई की तपती सड़कों पर पेट भरने के लिए जेब्रा क्रॉसिंग पेंट करना और फिल्मों के पोस्टर रंगना—यह वह जमीन थी जहां नाना का यथार्थ गढ़ा गया था। सर जे. जे. इंस्टीट्यूट से कमर्शियल आर्ट की तालीम लेने वाला यह नौजवान जब थियेटर की लकड़ी के तख्तों से होता हुआ रुपहले परदे पर पहुंचा, तो उसने स्थापित सितारों की दुनिया में खलबली मचा दी।

वे अभिनय नहीं करते थे, बल्कि किरदार की खाल ओढ़कर समाज के पाखंड के चेहरे पर जोर का तमाचा जड़ते थे। ‘परिंदा’ का खौफनाक और जटिल अन्ना हो, ‘प्रहार’ का अनुशासित मेजर चौहान या फिर ‘क्रांतिवीर’ का वो बेबाक प्रताप, जो चौराहे पर दोनों हाथों से हिंदू और मुसलमान का खून मिलाकर पूछता है—”ये खून किसका है, बता?” उस दृश्य में नाना सिर्फ संवाद नहीं बोल रहे थे, वे हमारे दौर की बीमार मानसिकता का चीरहरण कर रहे थे। उनका हाथ हिलाने का अंदाज, ठहराव और गले से निकलती वो गुर्राहट दरअसल आम हिंदुस्तानी के भीतर दबे गुस्से की आवाज थी।

व्यक्तिगत जिंदगी में भी वे हमेशा एकाकी और अपनी शर्तों पर जीने वाले इंसान रहे। पत्नी नीलकांति के साथ अलगाव के बावजूद मर्यादा, महज दो साल की उम्र में बेटे दुर्वासा को खोने का गहरा अनकहा जख्म, बेटे मल्हार के प्रति पिता का मूक स्नेह और 99 बरस तक साए की तरह साथ रहने वाली मां निर्मला का वात्सल्य—इन सबने नाना को भीतर से बेहद संवेदनशील और बाहर से सख्त बना दिया था। जब किसान अपनी सूखी जमीनों पर खुदकुशी कर रहे थे, तो बांद्रा के बंगलों में एसी की हवा खाने के बजाय नाना नाम फाउंडेशन के जरिए उनके आंसुओं को पोंछने लातूर और विदर्भ की धूल फांक रहे थे।

आज जब वे अनंत की यात्रा पर निकल चुके हैं, तो लगता है कि हिंदी और मराठी सिनेमा ने अपना सबसे खरा सिक्का खो दिया है। परदे पर अब कई कलाकार आएंगे, चिल्लाएंगे और तालियां बटोरेंगे, लेकिन उस गहराई और ईमानदारी के साथ कोई नहीं कह पाएगा कि “एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है…”

अलविदा नाना! आपने परदे पर भी जिंदगी जी और जिंदगी के परदे पर भी कभी नकली अभिनय नहीं किया। रंगमंच खाली हो गया है, मगर आपकी गूंज हमेशा बाकी रहेगी।

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