शाम ज़रा-सी गुलाबी क्या हुई, उदयपुर ने अपनी पुरानी शॉल उतारकर सुरों की चादर ओढ़ ली

फोटो एंड वीडियो : कमल कुमावत

उदयपुर। दीपावली की रौशनी में नहाया हुआ नगर निगम का मेला… जहां एक तरफ़ दुकानें अपनी पूरी आस्तीनें समेटे खरीदारों की चहलकदमी से बातें कर रही थीं, वहीं दूसरी तरफ़ मंच पर कुछ कच्ची-पक्की, मगर बेहद खरी प्रतिभाओं ने अपनी आवाज़ और पाज़ेब की झनकार से रात को जगाए रखा।

कहते हैं न, कुछ शहर सिर्फ़ ईंट और गारे से स्मार्ट नहीं होते; उनकी रूह में हुनर सांस लेता है। इस मेले ने बस वही किया—उस हुनर को एक आँगन दे दिया।

जब सुरों और थिरकन ने थाम लिए चलते हुए क़दम

मंच पर शमा जली, तो जैसे सरस्वती और गणेश के सामने सिंदूरी रोशनी मुस्कुरा उठी। महापौर पारस सिंघवी और तमाम खास-ओ-आम की मौजूदगी में महफ़िल का परदा उठा।

फिर जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने भीड़ की रफ़्तार को बांध दिया:

माहिका के पांवों ने जब ‘मधुबन में राधिका नाची रे’ की ताल पकड़ी, तो लगा फ़ज़ा में घुंघरू बिखर गए हैं।

देवांश त्रिवेदी की आवाज़ से ‘हल्दीघाटी में समर लड़ियो’ गूंजा, तो मिट्टी की खुशबू रगों में दौड़ गई।

दियरा जुनेजा की क्लासिकल अदाकारी और चेल्सी दाधीच के बोल—‘केसरिया बना ओ थारी बोली प्यारी लागे’—ने हवा में हल्की-सी मिठास घोल दी।

तन्वी राव ने किशोर दा की यादों की खिड़की खोली, तो वहीं राधिका भाटिया ने ‘कैसे मैं मिलाऊं नैन’ की तान छेड़कर समां ही बदल दिया।

प्रिया गोस्वामी ने जब तबले और ढोलक की संगत में ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ छेड़ा, तो दिलों की धड़कनें बेतरतीब हो गईं।

यहां तक कि पूर्व पार्षद मुकेश शर्मा ने भी गुनगुनाया—‘अपनी तो जैसे-तैसे’—और दाद देने वालों की तालियाँ देर तक गूंजती रहीं। कर्तव्य दवे और उनके ऑर्केस्ट्रा ने हर सुर को एक तराशा हुआ लिबास पहनाया।

हुनर को परखने की वो बारीक नज़र

यह मंच यूं ही किसी के हिस्से नहीं आया। कलाकार चयन समिति की अध्यक्ष निधि गोधा और आयुक्त अभिषेक खन्ना की अगुवाई में मनमोहन भटनागर, अमित यादव और डॉ. वीणा लोहार जैसे तपे हुए पारखियों ने हर सुर और ताल को तराशा था। जब महापौर और आयुक्त के हाथों से उन फनकारों को सनद (प्रशस्ति पत्र) मिली, तो चेहरों पर खिलती मुस्कान बता रही थी कि हौसले की कीमत क्या होती है।

गुलाबी ठंड, गर्म चाय और झूलों की सरगोशियां

प्रेस समिति के अध्यक्ष प्रताप सिंह राठौड़ का कहना दुरुस्त है—मेला केवल मंच पर नहीं था, मेला तो हर उस कोने में था जहाँ बच्चे झूलों पर हँस रहे थे और लोग दुकानों से कुछ न कुछ यादें बटोर रहे थे।

 

हवा में घुलती हल्की-सी सिहरन ने गर्म पकवानों के तवों से उठते धुएं को और ख़ुशगवार बना दिया था। टाउन हॉल से लेकर आरसीए ग्राउंड तक गाड़ियाँ सलीके से थमी रहीं और सिविल डिफेंस के जवानों ने शहर की नब्ज़ को जाम होने से बचाए रखा। महापौर ने खुद रात के सन्नाटे में उतरने से पहले इंतज़ामात की नब्ज़ टटोली—सफ़ाई और सुगमता की ताकीद करते हुए।

आज रात लफ़्ज़ तीर बनेंगे…

मेला संयोजक प्रमोद सामर की मानें तो यह सुरमई दास्तान यहीं नहीं थमी। आज की रात काग़ज़ पर स्याही नहीं, जज़्बात उतरेंगे। शैलेश लोढ़ा और मुल्क के नामचीन शायर व कवि अपने लफ़्ज़ों से उदयपुर की इस गुलाबी रात को एक नई नज़्म देंगे।

 

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