फोटो एंड वीडियो : कमल कुमावत
उदयपुर। रात ने जब उदयपुर के कानों में हौले से सरगोशी की, तो टाउनहॉल का आंगन किसी सजी हुई ग़ज़ल के मतले की तरह खुल गया। यह दीपावली मेले का चौथा दिन था—एक ऐसा दिन, जो बाहर से आए सितारों का नहीं, बल्कि इसी शहर की अपनी मिट्टी, अपनी संकरी गलियों और अपने आशियानों से निकले हुनर का था।
रोशनी में नहाई इमारत के नीचे जब देव डांस एकेडमी ने गणपति वंदना के सुर छेड़े, तो लगा जैसे वक्त अपनी रफ्तार भूलकर ठहर गया हो। फिर एक-एक कर सुर, ताल और ख़्वाब मंच पर उतरने लगे।
गायत्री पवार के कदमों ने जब ‘पिया तोसे नैना लागे रे’ की थाप पकड़ी, तो हवा में घुंघरुओं की खुशबू तैरने लगी। कहीं हेमंत की आवाज़ में ‘तेरी दीवानी’ का सूफियाना दर्द था, तो कहीं नन्हीं ओनीरा ने जब ‘ओ मेरे सोना रे सोना रे’ गुनगुनाया, तो मासूमियत पर पूरा मजमा मुस्कुरा उठा।
रिद्धिमा के कथक के फेरों में सदियों की रिवायत थी, तो नियति सोमपुरा के महाभारत नृत्य में इतिहास का ठहराव। धनंजय सोनी की बांसुरी से बहती मीठी हवा ने दिलों को छुआ, विजयलक्ष्मी के नग़मों में शोखी थी, और जोया की प्रस्तुति पर तालियों का एक पूरा मौसम बरस पड़ा। वहीं राजू सिंह और पुलिस योग टीम के एक्रो योगासनों ने सांसें थाम दीं। वर्णिका, जेनीका, ओजस्वी, पूर्वी, खुशी, आरुषि और यष्टि ग्रुप… कितने नाम लें, हर नाम एक नया तराना बन गया था।
मेला संयोजक प्रमोद सामर और महापौर पारस सिंघवी की मौजूदगी में जब दीप जले, तो बात सिर्फ़ मेले की नहीं, बल्कि अपने ही शहर के उभरते सितारों को एक खुला आसमान देने की थी। खोड़निया, चौहान, गौरा, मीणा और श्रीमाली सहित तमाम चेहरों ने इन नन्हे चिरागों की चमक को अपनी दुआएं दीं। मीनल पोखरना के लफ्ज़ मंच से बहते रहे और योगेश कुमावत के शुक्रिया पर शाम का एक पहर मुकम्मल हुआ।
उपायुक्त हरि सिंह देवल ने जब यह भरोसा दिलाया कि सोमवार को भी यह मंच शहर के अपने परिंदों के लिए खुला रहेगा, तो बच्चों की आंखों में एक नई चमक उतर आई।
झूलों की ऊंचाई पर हंसती हवाएं, पकवानों की सौंधी महक और दुकानों की चहल-पहल के बीच यह रात अब एक नए मिजाज की तरफ मुड़ रही है। आज की शाम ज़िंदगी के रोजमर्रा के सिलवटों पर हंसी की धूप बिखेरने आ रहे हैं स्टैंडअप कॉमेडियन गौरव गुप्ता—ताकि शहर जब हंसे, तो दिल खोलकर हंसे।
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