उदयपुर में 13वां इंडिया CSR एवं ESG समिट : सेवा और पूंजी के तालमेल से बदलेगी दिव्यांगों की जिंदगी, केंद्रीय मंत्री ने की शिरकत

उदयपुर। हमारे देश में जब भी कॉरपोरेट जगत की बात होती है, तो एक वर्ग उसे केवल ‘मुनाफ़ाखोर’ करार देकर खारिज कर देता है, जबकि दूसरा वर्ग सरकारी खजाने से चलने वाली जनकल्याणकारी योजनाओं को ही गरीबी और पिछड़ेपन का एकमात्र इलाज मानता है। लेकिन यह आर्थिक सोच पूरी तरह से एकांगी है। जब तक निजी पूंजी की कार्यकुशलता और ज़मीनी सामाजिक सेवा का सटीक तालमेल नहीं होगा, तब तक वास्तविक आर्थिक समावेशन (Inclusive Growth) असंभव है। उदयपुर में संपन्न हुआ 13वां इंडिया CSR एवं ESG समिट इसी व्यावहारिक अर्थशास्त्र की एक उम्दा मिसाल पेश करता है।

नारायण सेवा संस्थान और सीएसआर बॉक्स द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में करीब 2,000 कॉरपोरेट दिग्गजों और एनजीओ का जुटना यह साबित करता है कि अब भारतीय उद्योग जगत सीएसआर (Corporate Social Responsibility) को सिर्फ अनिवार्य टैक्स या कानूनी खानापूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक निवेश के रूप में देख रहा है।

चैरिटी बनाम पूंजीगत दक्षता : नारायण सेवा का मॉडल

संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने जब दिव्यांगजनों के मुफ्त ऑपरेशन, कृत्रिम अंग (Prosthetics) और व्यावसायिक पुनर्वास का खाका पेश किया, तो यह अर्थशास्त्र के बुनियादी सिद्धांत ‘ह्यूमन कैपिटल फॉर्मेशन’ (मानव पूंजी निर्माण) को छूता दिखा।

यदि आप किसी दिव्यांग व्यक्ति को सिर्फ भिक्षा या सरकारी वजीफा देते हैं, तो वह ताउम्र एक उपभोक्ता बनकर रह जाता है। लेकिन जब अत्याधुनिक मेडिकल सर्जरी और कैलिपर्स के जरिए उसे चलने-फिरने और हुनर सीखने लायक बनाया जाता है, तो वह आर्थिक रूप से स्वावलंबी नागरिक बनता है और जीडीपी में योगदान देने लगता है। यह दया नहीं, बल्कि मानवीय क्षमता में किया गया हाई-रिटर्न निवेश है। यही कारण है कि प्रशांत अग्रवाल का कॉरपोरेट साझेदारी पर जोर देना आर्थिक रूप से बिल्कुल सटीक बैठता है—क्योंकि एनजीओ के पास सेवा की ज़मीनी पहुंच है और उद्योग जगत के पास पूंजी व प्रबंधन की दक्षता।

शिवराज सिंह चौहान का ग्रामीण आह्वान: CSR का भौगोलिक संतुलन जरूरी

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस मंच से कॉरपोरेट जगत को ग्रामीण विकास की ओर मुखातिब होने की जो सलाह दी, वह नीतिगत रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। भारत में सीएसआर का एक बड़ा दोष यह रहा है कि अधिकांश फंड कुछ चुनिंदा औद्योगिक राज्यों और महानगरों के इर्द-गिर्द ही खर्च हो जाता है।

यदि भारत की 65% आबादी वाले ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा, प्राथमिक स्वास्थ्य और आधुनिक कृषि तकनीक नहीं पहुंचेगी, तो मांग में टिकाऊ उछाल कैसे आएगा? कॉरपोरेट जगत को समझना होगा कि ग्रामीण भारत केवल सेवा का क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह उनका सबसे बड़ा भावी बाजार भी है। गाँव समृद्ध होंगे, तो कारें, साबुन और मोबाइल फोन भी ज्यादा बिकेंगे।

ईएसजी: महज पीआर नहीं, टिकाऊ कारोबार की अनिवार्यता

सम्मेलन में आईआईटी मद्रास के प्रो. अश्विन महालिंगम और सांसद डॉ. अजीत माधवराव घोपचड़े की मौजूदगी ने एक बात स्पष्ट कर दी—पर्यावरण (E), समाज (S) और गवर्नेंस (G) अब केवल सालाना रिपोर्ट सजाने के फैंसी शब्द नहीं रह गए हैं। वैश्विक निवेशक अब उन्हीं कंपनियों में पैसा लगा रहे हैं जो समाज और पर्यावरण के प्रति जवाबदेह हैं। ‘डूइंग गुड फॉर भारत अवार्ड’ जैसे प्रोत्साहन इस बात की पुष्टि करते हैं कि अच्छा काम करना और मुनाफ़ा कमाना दो परस्पर विरोधी बातें नहीं हैं।

भारत को आज जरूरत इस बात की है कि सीएसआर केवल कागजी चेक काटने तक सीमित न रहे, बल्कि उद्योग जगत और नारायण सेवा संस्थान जैसे जमीनी संगठनों का यह गठबंधन देश के सबसे कमजोर तबके को उत्पादक कार्यबल में तब्दील करने का स्थायी जरिया बने।

 

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