माटी की महक, सुरों की सरगम और रोशनी का समंदर : उदयपुर के दिल में धड़का पारम्परिक दीपावली मेला

फोटो एंड वीडियो : कमल कुमावत

जब टाउनहॉल के प्रांगण में एक साथ उतर आई भक्ति, परंपरा और उत्सवधर्मिता, 300 दुकानों की रौनक और झूलों के संग मुस्कुराया शहर

उदयपुर। मेले किसी भूगोल की सीमा में बंधे बाजार भर नहीं होते; वे किसी शहर की सामूहिक आत्मा और उसकी सांस्कृतिक धड़कन के जीवंत उत्सव होते हैं। जब पत्थरों और झीलों का ऐतिहासिक शहर उदयपुर अपने रोजमर्रा के तनावों को झाड़-पोंछकर टाउनहॉल के आँगन में उतरता है, तो रोशनी सिर्फ बिजली की झालरों में नहीं, बल्कि वहाँ पहुँचे हर आम और खास चेहरे की मुस्कान में जगमगाने लगती है।

 

बुधवार की रात जब नगर निगम के 15 दिवसीय दीपावली मेले का पर्दा उठा, तो लगा मानो लेकसिटी ने लोकसंस्कृति और आस्था की सतरंगी चादर ओढ़ ली हो। एक ओर मर्यादा पुरुषोत्तम के भजनों से छनकर आती रूहानी शांति थी, तो दूसरी ओर राजस्थान की माटी से उपजी लोकधुनों का ऐसा उन्मुक्त वेग, जिसने पंडाल में बैठे हजारों दिलों को एक सुर, एक ताल में थिरकने पर विवश कर दिया।

 

अनामिका के रामभजन और छोटू सिंह की लोकतान: भक्ति व माटी का मिलन
मंच पर जब कवयित्री व भजन गायिका अनामिका अम्बर ने सुर साधा, तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की महिमा से जुड़ा हर पद श्रोताओं के अंतस को छू गया। उनके रामभजनों ने पूरे प्रांगण को एक भावुक और एकाग्र तन्मयता से भर दिया; पंडाल में गूंजती करतल ध्वनियां इस बात का प्रमाण थीं कि सुर जब भक्ति में ढलते हैं, तो वह संगीत से आगे बढ़कर आत्मिक विश्राम बन जाते हैं।

इसके बाद मंच पर जब लोकगायक छोटू सिंह रावणा की बुलन्द आवाज गूंजी, तो माहौल में मरुधरा की शौर्यगाथा और लोकभक्ति का अनूठा रंग घुल गया। ढोलक और खड़ताल की लय पर बंधे पारम्परिक राजस्थानी गीतों ने ऐसा समां बांधा कि दर्शक अपनी कुर्सियां छोड़ झूमने लगे। लोक और शास्त्रीयता के इस सहज मिलन ने पहले ही दिन उत्सव को जनमानस के सीधे संवाद में तब्दील कर दिया।

विघ्नहर्ता की वंदना से आगाज, जनप्रतिनिधियों का समागम

मेले का शुभारंभ भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन और मंत्रोच्चार के साथ हुआ। महापौर पारस सिंघवी ने शहरवासियों और पर्यटकों का आह्वान करते हुए कहा कि यह मेला केवल खरीद-फरोख्त का ठिकाना नहीं, बल्कि हमारी साझा विरासत और स्थानीय प्रतिभाओं को संबल देने का पारिवारिक मंच है।

जनजाति विकास मंत्री बाबूलाल खराड़ी ने स्थानीय कलाकारों के संरक्षण को रेखांकित किया, वहीं महामंडलेश्वर रासबिहारी शरण ने दीपोत्सव के आध्यात्मिक महत्व और सनातन परंपराओं की जीवंतता का संदेश दिया।

इस अवसर पर राज्यसभा सांसद चुनीलाल गरासिया, विधायक ताराचंद जैन, ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा, पूर्व सांसद रघुवीर सिंह मीणा, भाजपा शहर अध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़, कांग्रेस शहर अध्यक्ष फतह सिंह राठौड़, पूर्व सभापति युधिष्ठिर कुमावत, रविन्द्र श्रीमाली, पूर्व महापौर रजनी डांगी, निगम आयुक्त अभिषेक खन्ना और देवीलाल सालवी सहित शहर के अनेक प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे।

झूलों का रोमांच और 300 दुकानों का गुलजार संसार

टाउनहॉल की ऐतिहासिक इमारत पर की गई सुरुचिपूर्ण विद्युत सज्जा रात के अंधेरे में किसी जगमगाते महल की तरह दमक रही थी। दर्शकों के लिए विशालकाय एलईडी स्क्रीनें लगाई गई थीं ताकि दूर बैठे लोग भी मंच की एक-एक प्रस्तुति को करीब से देख सकें।

 

परिसर में सजी करीब 300 दुकानों पर खान-पान के चटखारे, हस्तशिल्प, पारम्परिक वस्त्र, जूते और देश के विविध कोनों से लाई गई कलाकृतियों को निहारते और खरीदते परिवारों की चहल-पहल देर रात तक बनी रही। वहीं, 15 छोटे-बड़े झूलों पर बच्चों और युवाओं की हंसी और खिलखिलाहट ने पूरे मेले को उत्सव के ठेठ देशी रंग में रंग दिया।

11 नवंबर तक रहेगा मेला, आज लोकधुनों के नाम रहेगी शाम

नगर निगम द्वारा आयोजित यह मेला 11 नवंबर तक चलेगा, जिसमें 3 नवंबर तक सांस्कृतिक संध्याओं का अनवरत सिलसिला रहेगा।

गुरुवार शाम को मंच पर ‘रेपरिया बालम बैंड’ और ‘फकीरा खान फोक बैंड’ अपनी आधुनिक व पारम्परिक लोकधुनों का जादू बिखेरेंगे, जहां राजस्थानी माटी के सुर एक बार फिर शहरवासियों को अपनी जड़ों की समृद्ध विरासत से जोड़ेंगे।

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